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सरमा की स्ट्रैटेजी और BJP की हैट्रिक: असम में क्यों फेल हुआ विपक्ष; जानें आज के एक्सप्लेनर में

Assam Election 2026 Result: असम विधानसभा चुनाव 2026 के चुनाव नतीजों में एक बार फिर बीजेपी सरकार बनती दिख रही है। इस जीत के साथ बीजेपी ने राज्य की राजनीति में अपने वर्चस्व को बरकरार रखा। अब तक के आए रुझान बता रहे हैं कि कांग्रेस की अगुआई वाला विपक्षी गठबंधन पिछड़ गया है। यानी असम के वोटरों ने सीएम हिमंता बिस्वा सरमा पर भरोसा दिखाया है और उनकी हेट्रिक सरकार बनती दिख रही है। सवाल यही है कि आखिर बीजेपी गठबंधन ने 90+ सीटों पर यह बढ़त कैसे बनाई और विपक्ष क्यों मजबूत चुनौती नहीं दे पाया। आइये समझते हैं आज के एक्सप्लेनर में कि वे कौन से पहलू और मुद्दे रहे जो बीजेपी के पक्ष में गए और बीजेपी के लिए जीत की बुनियाद रखी।

हिमंता बिस्वा सरमा का नेतृत्व फैक्टर

असम में बीजेपी की सफलता के केंद्र में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का मजबूत लीडरशिप रहा। उनकी आक्रामक शैली, तेज फैसले लेने की क्षमता और जमीनी कनेक्शन ने मतदाताओं के बीच भरोसा पैदा किया। कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण और प्रशासनिक पकड़ ने उन्हें एक प्रभावी नेता के रूप में स्थापित किया, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को इस चुनाव में मिला।

विकास और वेलफेयर की राजनीति

बीजेपी ने चुनाव में विकास को मुख्य मुद्दा बनाया। सड़क, इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट्स को उपलब्धि के तौर पर पेश किया गया। पीएम नरेंद्र मोदी ने चुनाव से पहले असम दौरे पर कांग्रेस पर हमला किया था। पीएम मोदी ने कहा था, 'कांग्रेस वालों के दिमाग का ताला जहां बदं हो जाता है, वहां हमारा काम शुरू होता है।' पीएम ने कहा, 'कांग्रेस खुद के इतिहास के हार की सेंचुरी मारने वाली है। राज्य सरकार की ‘ओरुनोदोई’ जैसी योजनाओं के जरिए महिलाओं और गरीबों तक सीधी आर्थिक मदद पहुंची। इससे सरकार की ‘डिलीवरी’ की छवि मजबूत हुई और मतदाताओं में विश्वास बढ़ा कि राज्य विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

विपक्ष की कमजोरी और बिखराव

इस चुनाव में कांग्रेस के पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण पार्टी में बिखराव भी रहा है। सांसद प्रद्युत बोरदोलोई और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन कुमार बोराह ने कांग्रेस का दामन छोड़ बीजेपी जॉइन कर ली। यानी चुनाव से पहले ही कांग्रेस ने अपने जनाधार वाले नेता गंवा दिए। यही कारण है कि चुनावी मैदान में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई के नेतृत्व के बावजूद विपक्ष बीजेपी की संगठित मशीनरी का मुकाबला नहीं कर सका। एआईयूडीएफ से गठबंधन न होने के कारण मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ, जबकि सीट बंटवारे को लेकर असमंजस ने विपक्ष की स्थिति और कमजोर कर दी।

नैरेटिव, परिसीमन और सामाजिक समीकरण

बीजेपी ने ‘पूर्वोत्तर की अनदेखी’ वाले नैरेटिव को बदलते हुए विकास और पहचान की राजनीति को मजबूत किया। साल 2023 के परिसीमन के बाद कई सीटों के समीकरण बदले, जिससे विपक्ष के लिए वोटों को सीटों में बदलना मुश्किल हुआ। इसके साथ ही चुनावी सभाओं में घुसपैठ, पहचान और सुरक्षा जैसे मुद्दों ने भी बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाया। जबकि राहुल गांधी के 'हिमंता को जेल भेजेंगे' वाला बयान कांग्रेस के खिलाफ गया। इस चुनाव के दौरान कांग्रेस की ओर से सीएम सरमा की पत्नी पर दुबई में संपत्ति और कई पासपोर्ट रखने के आरोप लगाए गए।

10 साल पहले कांग्रेस से छीन गई थी असम की सत्ता

असम में लंबे समय तक कांग्रेस का शासन रहा, जिसमें तरुण गोगोई के नेतृत्व में स्थिर सरकार देखने को मिली, लेकिन समय के साथ एंटी-इंकंबेंसी और विकास की धीमी रफ्तार जैसे मुद्दे उभरने लगे। लेकिन साल 2016 के बाद बीजेपी ने सत्ता संभाली और सरमा के नेतृत्व में प्रशासनिक सख्ती, तेज फैसले और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया। इससे बीजेपी ने खुद को एक ‘डिलीवरी-ओरिएंटेड’ सरकार के रूप में पेश किया।

2016 के चुनाव में कांग्रेस का रहा था सबसे खराब प्रदर्शन

शाम 5 बजे तक के रुझानों में कांग्रेस करीब 20 सीटों पर आगे चल रही है। अगर यही रुझान नतीजों में तब्दील होते हैं, तो यह असम में उसके चुनावी इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन साबित होगा। इससे पहले कांग्रेस का न्यूनतम आंकड़ा 2016 में 26 सीटों का रहा था। उस समय पार्टी के कमजोर प्रदर्शन की बड़ी वजह हिमंता बिस्वा सरमा का कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाना माना गया था, जिसका असर आज भी राज्य की राजनीति में साफ दिखाई देता है।

नई सरकार के सामने चुनौतियां

रुझान साफ संकेत दे रहे हैं कि बीजेपी एक बार फिर सत्ता में लौट रही है, लेकिन असली चुनौती अब वादों को जमीन पर उतारने की होगी। समान नागरिक संहिता, घुसपैठ पर सख्ती, रोजगार सृजन और महिलाओं को आर्थिक मदद जैसे बड़े वादों को पूरा करना आसान नहीं होगा। नई सरकार को विकास और सामाजिक संतुलन के बीच तालमेल बनाते हुए जनता के भरोसे पर खरा उतरना होगा।

Sunil Gupta

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