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सऊदी अरब-पाक-तुर्किये का रक्षा समझौता, एक पर हमला तो तीनों पर माना जाएगा हमला

Saudi Pakistan Turkiye Defence Agreement: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने बढ़ते क्षेत्रीय सैन्य तनाव के बीच संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। शुक्रवार को जारी संयुक्त बयान के मुताबिक, तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर भी हमला माना जाएगा। समझौते का उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा मजबूत करने के साथ क्षेत्र और उससे बाहर शांति, सुरक्षा व स्थिरता को बढ़ावा देना है।

करीब एक साल चली बातचीत

‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ को लेकर करीब एक साल से बातचीत चल रही थी। मक्का में समझौते पर हस्ताक्षर होने से इसे खास प्रतीकात्मक महत्व भी मिला है। यह समझौता लंबे समय से चले आ रहे तीनों देशों के सैन्य सहयोग को और मजबूत करता है।

पाकिस्तान दशकों से सऊदी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देता रहा है। तुर्किये और पाकिस्तान के बीच भी युद्धपोत और प्रशिक्षण विमान से जुड़े सहयोग हैं। 2023 में सऊदी अरब ने तुर्किये के ड्रोन खरीदने पर सहमति जताई थी, जिसे अंकारा ने अपना सबसे बड़ा रक्षा निर्यात सौदा बताया था।

ईरान संघर्ष के बीच बढ़ी अहमियत

यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब सऊदी अरब ईरान और उसके सहयोगियों से जुड़े हमलों का सामना कर रहा है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के बाद क्षेत्रीय संघर्ष ने सऊदी अरब के तेल निर्यात और महत्वाकांक्षी विकास योजनाओं को प्रभावित किया है। इससे उसकी लंबे समय से चली आ रही अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे हैं।

पाकिस्तान और तुर्किये बड़े सीधे हमलों से बचे हैं, लेकिन दोनों क्षेत्रीय संघर्षों को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि इनका असर उनकी सुरक्षा और अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।

बदलेगा क्षेत्र का सुरक्षा ढांचा?

विश्लेषकों के मुताबिक, यह समझौता तीन बड़े मुस्लिम देशों की क्षमताओं को एक मंच पर लाता है। पाकिस्तान अपनी परमाणु क्षमता, अनुभवी सेना और हथियारों के साथ, तुर्किये आधुनिक ड्रोन व रक्षा प्रणालियों तथा NATO सदस्यता के साथ, जबकि सऊदी अरब अपनी आर्थिक ताकत के साथ इस गठजोड़ को मजबूती देता है।

विशेषज्ञ इसे ‘डिटरेंस और डिप्लोमेसी’ को साथ लाने वाला कदम बता रहे हैं। समझौता किसी खास देश के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसका घोषित उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता है। हालांकि, इससे सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ने की भी उम्मीद जताई जा रही है।

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