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ममता को छोड़ने वाले TMC के बागी 58 विधायकों ने अरूप रॉय को चुना अपनी पार्टी का अध्यक्ष, पार्टी फंड के लेन-देन पर लगी रोक

Arup Roy News: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सियासी घमासान तेज हो गया है। विधानसभा चुनाव 2026 में मिली करारी हार के बाद पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी अब अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट का सामना कर रही हैं। पार्टी के भीतर बढ़ती बगावत ने अब संगठनात्मक ढांचे को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। विपक्ष के नेता रीताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने विधायक अरूप रॉय को पार्टी अध्यक्ष चुनकर ममता बनर्जी की नेतृत्व क्षमता को खुली चुनौती दे दी है। इस घटनाक्रम ने संकेत दे दिए हैं कि विधानसभा और संसद से शुरू हुई नाराजगी अब TMC के संगठनात्मक गढ़ तक पहुंच चुकी है, जिससे पार्टी में बड़े राजनीतिक बदलाव की अटकलें तेज हो गई हैं।

बागी गुट ने बनाया नया संगठन

बागी विधायकों, पार्षदों और अन्य नेताओं की मौजूदगी में आयोजित विशेष सत्र में रीताब्रता बनर्जी ने घोषणा की कि अरूप रॉय को सर्वसम्मति से पार्टी का अध्यक्ष चुना गया है। इसके साथ ही पूर्व मंत्री अरूप बिस्वास और विधायक फिरहाद हकीम, रथिन घोष तथा सबीना यास्मीन को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। वहीं, रीताब्रता बनर्जी, जावेद खान और संदीपन साहा को महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई। नए संगठनात्मक ढांचे के गठन के साथ ही बागी गुट ने पार्टी में बड़ा बदलाव करते हुए अभिषेक बनर्जी की राष्ट्रीय महासचिव के रूप में भूमिका को प्रभावी तौर पर समाप्त कर दिया, जिससे TMC के भीतर सत्ता संघर्ष और गहरा होता नजर आ रहा है।

पार्टी फंड पर भी घमासान

टीएमसी के भीतर जारी सियासी संघर्ष अब पार्टी के वित्तीय मामलों तक पहुंच गया है। बागी विधायकों की शिकायत के बाद पुलिस ने पार्टी के तीन बैंक खातों में मौजूद करीब 440 करोड़ रुपये के लेन-देन पर रोक लगा दी है। शिकायत में फंडिंग के स्रोत को लेकर सवाल उठाए गए थे। हालांकि, रीताब्रता बनर्जी ने ममता बनर्जी के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख दिखाते हुए उन्हें बागी गुट की मुख्य सलाहकार बनने का प्रस्ताव भी दिया। उन्होंने कहा कि यदि ममता बनर्जी यह भूमिका स्वीकार करना चाहें तो उनका स्वागत किया जाएगा। इस बयान को बागी गुट की ओर से समझौते और राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

संसद में भी कमजोर हुई TMC, 20 सांसदों ने छोड़ा साथ

तृणमूल कांग्रेस को हाल ही में संसद में भी बड़ा झटका लगा, जब उसके 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होने का फैसला कर लिया। इन सांसदों ने बाद में नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की घोषणा की और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन देने का ऐलान किया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ संसद में TMC की ताकत को कमजोर किया है, बल्कि ममता बनर्जी के नेतृत्व पर उठ रहे सवालों को भी और तेज कर दिया है।

Sunil Gupta

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