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ईरान में सड़कों पर उतरे 2 करोड़ लड़ाके! क्या है ‘बासिज’, जिसे खामेनेई का सबसे बड़ा ढाल माना जाता है?

Iran Basij Militia: ईरान में बढ़ते जनविरोध ने सत्ता की नींव हिला दी है। महंगाई और आर्थिक बदहाली के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोगों को काबू में करने के लिए सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की सरकार ने अपना सबसे सख्त हथियार मैदान में उतार दिया है बासिज बल। संसद की सिफारिश के बाद इस अर्द्धसैनिक संगठन को पूरे देश में तैनात कर दिया गया है। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि बासिज की कार्रवाई में अब तक सैकड़ों नागरिकों की जान जा चुकी है, जिससे हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं।

खामेनेई का आरोप: विरोध नहीं, विदेशी साजिश

9 जनवरी को जुमे की नमाज़ के बाद राष्ट्र के नाम संदेश में खामेनेई ने विरोध प्रदर्शनों को सीधे तौर पर अमेरिका से जोड़ा। उन्होंने कहा कि ईरान किसी दबाव में झुकने वाला नहीं है और देश की संप्रभुता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके तुरंत बाद राजधानी तेहरान समेत कई शहरों में बासिज बल की तैनाती तेज कर दी गई।

क्या है बासिज? नाम छोटा, ताकत विशाल

‘बासिज’ एक फारसी शब्द है, जिसका अर्थ होता है लामबंदी। इसकी स्थापना 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद हुई थी। तत्कालीन नेता अयातुल्लाह खुमैनी ने इसे एक ऐसे जन-आधारित बल के रूप में देखा था, जो देश को आंतरिक विद्रोह और विदेशी हस्तक्षेप से बचा सके। यह संगठन मुख्य रूप से ग्रामीण और कट्टर इस्लामिक पृष्ठभूमि से जुड़े स्वयंसेवकों से बना है। स्थानीय स्तर पर मस्जिदों के माध्यम से इसकी पकड़ मजबूत मानी जाती है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इसे ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) नियंत्रित करती है।

2 करोड़ की फौज, पहले भी कुचल चुका है विद्रोह

बासिज की अनुमानित संख्या करीब 2 करोड़ बताई जाती है, जिनकी उम्र 18 से 50 वर्ष के बीच है। इससे पहले 2009 और 2022 में भी इसी संगठन ने बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी आंदोलनों को दबाया था। अब एक बार फिर देश में भड़की असंतोष की आग को शांत करने की जिम्मेदारी इसी बल को सौंपी गई है।

अमेरिका की नजर में ‘खूंखार संगठन’

अमेरिका पहले ही बासिज और उसके कई कमांडरों पर प्रतिबंध लगा चुका है। वॉशिंगटन का आरोप है कि यह संगठन मानवाधिकार उल्लंघनों में अग्रणी भूमिका निभाता है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, बासिज पर असहमति को हिंसक तरीके से कुचलने के गंभीर आरोप हैं।

महंगाई से भड़का जनआक्रोश, अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा

27 दिसंबर 2025 से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों की जड़ महंगाई और आर्थिक संकट है। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने स्वीकार किया है कि जनता की मांगें जायज हैं, लेकिन उनका कहना है कि कुछ हिंसक तत्वों ने आंदोलन को भटका दिया। इस बीच, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बयान देकर हालात को और गरमा दिया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर ईरान में अत्याचार जारी रहे, तो अमेरिका हस्तक्षेप पर विचार कर सकता है। ईरान इस समय इतिहास के सबसे नाजुक दौर से गुजर रहा है जहां एक तरफ जनता का गुस्सा है और दूसरी तरफ सत्ता का सबसे कठोर सुरक्षा कवच, बासिज।

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Shagun Chaurasia

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