AI Impact Summit 2026: अगर आपकी डिजिटल दुनिया पहले से ज्यादा तेज और स्मार्ट लगता है, तो उसके पीछे सिर्फ सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि विशाल डेटा केंद्र काम कर रहे हैं। ये ऐसे औद्योगिक परिसर हैं जहां लाखों सर्वर चौबीसों घंटे चलते रहते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते उपयोग के साथ इन डेटा केंद्रों की ऊर्जा और पानी की खपत भी तेज़ी से बढ़ रही है।
Google की 2024 पर्यावरण रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में उसके डेटा केंद्रों ने लगभग 6.1 अरब गैलन ताजे पानी का उपयोग किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 17% अधिक है। यह मात्रा इतनी है कि इससे दक्षिण-पश्चिमी अमेरिका के दर्जनों गोल्फ कोर्सों की सालाना सिंचाई की जा सकती है। AI-आधारित सर्च, इमेज जनरेशन और चैटबॉट जैसी सेवाओं के विस्तार के साथ इन सर्वरों पर काम का बोझ बढ़ रहा है, और उसी अनुपात में ठंडा रखने की जरूरत भी।
जब आप किसी AI टूल से सवाल पूछते हैं या उससे कोई चित्र बनवाते हैं, तो हजारों प्रोसेसर एक साथ गणना करते हैं। यह प्रक्रिया बहुत अधिक तापीय ऊर्जा (heat) पैदा करती है। यदि इस गर्मी को नियंत्रित न किया जाए, तो उपकरण खराब हो सकते हैं। इसलिए डेटा केंद्र विशेष कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं।अक्सर बड़े कूलिंग टावरों के रूप में।
1.वाष्पीकरण आधारित शीतलन कैसे काम करता है?
2.गर्म मशीनों या हीट एक्सचेंजरों पर पानी डाला जाता है।
3.गर्मी सोख लेता है।
4.फिर वह वाष्प बनकर उड़ जाता है।
समस्या यह है कि इस प्रक्रिया में इस्तेमाल हुआ अधिकांश पानी भाप बनकर वातावरण में चला जाता है। यह पानी सीधे-सीधे स्थानीय जल चक्र से बाहर हो जाता है और दोबारा उपयोग में नहीं आता।
सवाल उठता है कि कंपनियां अपशिष्ट या पुनर्चक्रित पानी का उपयोग क्यों नहीं करतीं। इसका जवाब पानी की रासायनिक संरचना में छिपा है। पानी में कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे खनिज होते हैं। जब पानी बार-बार वाष्पित होता है, तो ये खनिज अधिक सघन हो जाते हैं। अंततः लाइमस्केल नामक कठोर परत बन जाती है। यह परत पाइप, पंप और हीट एक्सचेंजर को नुकसान पहुंचा सकती है और सिस्टम की कार्यक्षमता घटा देती है।
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रिसाइकिल पानी में खनिज और भी अधिक हो सकते हैं, जिससे संक्षारण (corrosion) का खतरा बढ़ जाता है। इसे सुरक्षित रूप से उपयोग करने के लिए बड़े और महंगे ट्रीटमेंट प्लांट लगाने पड़ते हैं। कई जगहों पर ऐसी आधारभूत संरचना उपलब्ध नहीं है, इसलिए नगर निगम के ताजे पानी का उपयोग करना कंपनियों के लिए आसान और सस्ता विकल्प बन जाता है।
वित्तीय संस्था Morgan Stanley की एक रिपोर्ट के अनुसार, AI डेटा केंद्रों की पानी की मांग 2028 तक कई गुना बढ़ सकती है। चिंता की बात यह है कि कई डेटा केंद्र ऐसे इलाकों में बन रहे हैं जहां पहले से ही जल संकट मौजूद है। हालांकि कंपनियां जल क्षतिपूर्ति (water offset) या संरक्षण परियोजनाओं का उल्लेख करती हैं, लेकिन ये परियोजनाएं अक्सर उस क्षेत्र से दूर होती हैं जहाँ पानी का वास्तविक उपयोग हो रहा होता है। इससे स्थानीय समुदायों को तुरंत राहत नहीं मिलती।
लाखों की संख्या में ये आंकड़े और भी चौंकाने वाले हो जाते हैं। प्रतिदिन दस लाख उपयोगकर्ता लगभग 6,800 किलोवाट घंटे बिजली की खपत करेंगे, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 225 घरों को एक दिन के लिए बिजली देने के लिए पर्याप्त है। 10 करोड़ उपयोगकर्ताओं पर, यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 680,000 किलोवाट-घंटे हो जाता है, जो लगभग 22,000 घरों की दैनिक खपत के बराबर है। भारत जैसे देशों में करोड़ों उपयोगकर्ताओं के साथ, इस पैमाने को समझना आसान हो जाता है।
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AI के अग्रणी स्टुअर्ट रसेल ने कहा कि AI इंफ्रास्ट्रक्चर महत्वपूर्ण संसाधनों का उपभोग करता है, लेकिन अन्य उद्योग इससे कहीं अधिक संसाधनों का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका में गोल्फ कोर्स सामूहिक रूप से प्रतिवर्ष सैकड़ों अरब गैलन पानी की खपत करते हैं - जो AI डेटा केंद्रों के वैश्विक जल उपयोग से कहीं अधिक है।
AI का विकास डिजिटल सुविधाएँ तो बढ़ा रहा है, लेकिन इसके साथ प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी बढ़ रहा है।
1.अधिक सर्वर = अधिक ऊर्जा खपत
2.अधिक गर्मी = अधिक कूलिंग
3. अधिक कूलिंग = अधिक पानी
जैसे-जैसे AI हमारे जीवन के हर क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यवसाय में गहराई से शामिल होगा, पानी जैसे बहुमूल्य संसाधन के प्रबंधन की चुनौती और बड़ी होती जाएगी। AI केवल कोड और एल्गोरिद्म नहीं है; यह भौतिक बुनियादी ढांचे पर निर्भर है जो पानी और ऊर्जा जैसे संसाधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग करता है। डिजिटल प्रगति और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा।
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