बिहार चुनाव

महागठबंधन में ‘मित्रता’ का महायुद्ध! 11 सीटों पर साथियों की टक्कर ने बदला बिहार चुनाव का खेल

Bihar Election Results Countdown: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों में अब कुछ ही घंटे बचे हैं, और उससे पहले महागठबंधन के भीतर हुई अंदरूनी टक्कर सुर्खियों में है। इस बार कांग्रेस, आरजेडी, वाम दलों और वीआईपी के बीच कई सीटों पर ऐसी स्थिति बनी, जिसने गठबंधन की एकजुटता को चुनौती ही नहीं दी, बल्कि उसके चुनावी गणित पर भी गहरा असर डाल दिया।

चुनाव प्रचार के दौरान महागठबंधन ने भले ही साझा मंच और एकता का दावा किया हो, लेकिन जमीन पर तस्वीर बिलकुल अलग थी। करीब 11 विधानसभा सीटों पर सहयोगी दल आमने-सामने नजर आए वो भी सीधे मुकाबले में। इसे ‘फ्रेंडली फाइट’ कहा गया, लेकिन इसका असर कहीं ज्यादा गंभीर था।

ये रही वे सीटें जहां महागठबंधन टूटा हुआ दिखा

  1. बिहारशरीफ़ (नालंदा)

यह सीट महागठबंधन की सबसे बड़ी टूट का प्रतीक बनी। कांग्रेस के उमै़र खान, CPI के दिनेश कुमार और RJD समर्थित उम्मीदवार तीनों मैदान में थे। तालमेल पूरी तरह विफल रहा और वोट बिखरने की आशंका बढ़ गई।

  1. राजापाकर (वैशाली)

कांग्रेस की प्रतिमा कुमारी दास, CPI के मोहित पासवान और RJD समर्थित उम्मीदवार के बीच तिकोनी लड़ाई दिखी। तीनों साझेदार दल अपने-अपने उम्मीदवारों को पीछे हटाने को तैयार नहीं हुए।

  1. बछवाड़ा (बेगूसराय)

यहाँ कांग्रेस के शिवप्रकाश गरीबदास और CPI के अवधेश कुमार राय अलग-अलग चुनाव लड़ते दिखे। जबकि महागठबंधन का मूल लक्ष्य एनडीए को चुनौती देना था, लेकिन सीट पर आंतरिक मुकाबला हावी रहा।

  1. वारसलीगंज (नवादा) और रोसड़ा (समस्तीपुर)

दोनों सीटों पर कांग्रेस और वाम दलों के उम्मीदवारों ने तालमेल के बजाय सीधे मुकाबले का रास्ता चुना, जिससे विपक्षी वोटों में भारी सेंध की संभावना बन गई।

  1. बेलदौर (खगड़िया)

यहाँ कांग्रेस के मिथिलेश निषाद और VIP उम्मीदवार के बीच महागठबंधन की ‘फ्रैंडली फाइट’ वोटों पर भारी पड़ी।

क्या था इस अंदरूनी संघर्ष का असर?

इन 11 सीटों पर महागठबंधन के भीतर मतभेदों ने हजारों वोटों के बिखरने की स्थिति पैदा कर दी। मतदाता भी उलझन में थे, जिन्हें सहयोगी कहना था, वे ही एक-दूसरे को चुनौती दे रहे थे। गठबंधन ने अंतिम चरण में तालमेल ठीक करने का प्रयास किया, लेकिन जिस तरह कई सीटों पर नामांकन और प्रचार पहले ही बंटा हुआ था, नुकसान को रोकना मुश्किल हो गया।

यह चुनाव साफ बताता है कि गठबंधन की मजबूती सिर्फ मंच पर नहीं, बल्कि सीटों के तालमेल में दिखती है। जहाँ तालमेल टूटा वहाँ महागठबंधन की सियासी धार भी कमजोर पड़ी। अब देखना यह है कि इन अंदरूनी लड़ाइयों का असर अंतिम नतीजों में कितना दिखता है।

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Shagun Chaurasia

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