प्लेन क्रैश में महाराष्ट्र डिप्टी सीएम और कैप्टन समेत सभी सवारों की मौत
Ajit Pawar Death: महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री और एनसीपी नेता अजित पवार को ले जा रहा एक प्लेन बुधवार सुबह महाराष्ट्र के बारामती में लैंडिंग की कोशिश करते वक्त क्रैश हो गया। हादसे में अजित पवार समेत 5 लोगों की मौत हो गई है। प्लेन क्रेश से पहले क्या प्लेन के पायलट ने आखिरी मेसेज मेडे (Mayday) भेजा था या प्लेन में कुछ तकनीकी गड़बड़ी थी है। इसकी जांच एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (एएआईबी) जांच करेगा। आइये जानते हैं आखिर ये मेडे क्या होता है।
मेडे एक इमरजेंसी मेसेज को बताने का अंतरराष्ट्रीय संकेतक है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से विमानन और समुद्री क्षेत्र में आपात स्थिति में मदद मांगने के लिए किया जाता है। हालांकि, अभी स्पष्ट नहीं हुआ है कि अजित पवार के प्लेन क्रेश से पहले कैप्टन ने मेडे कॉल की थी। वहीं, एक अन्य रिपोर्ट में प्लेन क्रेश से पहले कैप्टन के ओह शीट...ओह शीट...ओह शीट का दावा किया गया है।
मेडे कॉल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इमरजेंसी इंडिकेटर के तौर पर 100 साल पूरे कर लिए हैं। इसकी शुरुआत की बात करें तो फ्रेंच भाषा के "m'aider" (मेरी मदद करें) का उच्चारण मेडे होता है। मेडे कोड का इस्तेमाल तब किया जाता है जब कोई जहाज, विमान या व्यक्ति गंभीर खतरे में होता है और उसे तत्काल सहायता की आवश्यकता होती है। पहली बार इसका इस्तेमाल 1920 के दशक में ब्रिटिश रेडियो ऑपरेटर फ्रेडरिक स्टैनली मॉकफोर्ड ने प्रस्तावित किया था। वे लंदन के क्रॉयडन हवाई अड्डे पर काम करते थे. तब विमानन और समुद्री कम्युनिकेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्दों में फ्रेंच भाषा का बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता था।
प्लेन के इमरजेंसी सिचुएशन में सबसे पहले मेडे को तीन बार रिपीट किया जाता है। ATC को जैसे ही ये शब्द तीन बार सुनाई देता है, इसका मतलब होता है कि जिस प्लेन से ये आवाज आ रही है वो संकट की स्थिति में है। इसके बाद जहाज या विमान का नाम और कॉल साइन बताया जाता है। इसके बाद लोकेशन, आपातकाल की प्रकृति, और आवश्यक सहायता के बारे में जानकारी दी जाती है।
मेडे के अलावा प्लेन के टर्बूलेंस केस में कैप्टन अपनी समझदारी से पैन-पैन का इस्तेमाल करते हैं। यह कॉल तब होती है, जिसमें तुरंत जीवन का खतरा नहीं है या कोई मशीनी दिक्कत है जिससे उड़ान को तुरंत ही समस्या नहीं है। वहीं, एसओएस कॉल एक मोर्स कोड की तरह होता है। मोर्स कोड में डॉट्स (.) और डैश (-) की मदद से अक्षरों को भेजा जाता है। इसका इस्तेमाल समुद्री जहाजों या पुरानी संचार व्यवस्थाओं में किया जाता है।
एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो की टीम जल्द ही घटनास्थल का दौरा करेगी। एएआईबी की टीम घटना के कारणों की तलाश करेगी। क्या घटना तकनीकी खराबी की वजह से हुई है या इंजन में समस्या आई थी। एएआईबी की टीम सभी एंगल से मामले की जांच करेगी। सूत्रों के अनुसार, डीजीसीए की टीम भी घटनास्थल का दौरा कर सकती है।
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