धार जिले के भोजशाला में बसंत पंचमी की पूजा व जुम्मे की नमाज एक साथ शुरू
Bhojshala Dhar Dispute: शुक्रवार को मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित विवादित भोजशाला परिसर में कड़ी सुरक्षा के बीच बसंत पंचमी और जुमे की नमाज साथ-साथ की जा रही है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने समय और स्थान के बंटवारे का एक विशेष फॉर्मूला तय कर शांतिपूर्ण समाधान निकाला था, इसलिए भोजशाला में बसंत पंचमी की पूजा और नमाज दोनों हो रही है। ऐसे में भोजशाला पर 200 सालों से जारी स्टडी में अब तक क्या क्या जानकारियां सामने हैं। उसका ब्यौरा इस प्रकार विस्तार से है।
11वीं शताब्दी से भोजशाला के इतिहास की शुरुआत होती है। परमार वंश के शासक राजा भोज ने साल 1034 ईस्वी में धार को शिक्षा और संस्कृति का केंद्र बनाने के लिए सरस्वती सदन की स्थापना की। इसे ही भोजशाला कहा जाता है। यह एक आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय था, जिसे नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों की तरह बनाया गया था। माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भास्कर भट्ट समेत कई विद्वानों ने यहां शिक्षा ग्रहण की।
भोजशाला के भीतर परिसर में एक बड़ा खुला आंगन है, जिसके चारों ओर स्तंभों से बना एक बरामदा और पीछे पश्चिम में एक प्रार्थना घर है। खंभों, दीवारों और छतों पर संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख हैं। इनमें व्याकरण के सूत्र, काल, नाट्यशास्त्र से जुड़े अंश और देवी-देवताओं की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। बीचों बीच एक बड़ा सा कुंड है। राजा भोज की मृत्यु के 200 साल बाद तक यहां अध्ययन का काम चलता रहा।
1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर हमला किया और परमार शासन का अंत हुआ। इसके बाद भोजशाला के स्वरूप को बदलने की कोशिशें शुरू हुईं। कहा जाता है कि 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने भोजशाला परिसर को बदलने का प्रयास किया। परिसर के पास सूफी संत कमाल मौलाना की दरगाह बनाई गई। हालांकि, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह स्थान लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होता रहा।
1936 से 1942 के बीच नमाज और पूजा को लेकर यहां कई विवाद हुए। स्वतंत्रता के बाद 1952 में भोजशाला को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंप दिया गया। इस दौरान लंबे समय तक धार्मिक गतिविधियों पर प्रतिबंध रहा। 1995 के बाद इसे दोबारा खोलने की मांग बढ़ी। इसके बाद मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई। 12 मई, 1997 को भोजशाला में आम लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
23 जनवरी को बसंत पंचमी और शुक्रवार साथ है। इस पर हिंदू पक्ष ने पूरे दिन सरस्वती पूजा की अनुमति के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसी याचिका पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि हिंदू पक्ष सुबह से दोपहर 12 बजे तक पूजा करे सकेगा। इसके बाद दोपहर 1 से 3 बजे तक मुस्लिम पक्ष नमाज अदा करेगा।
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