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भगवान श्रीराम को भोजन में क्या था सबसे प्रिय? रामचरितमानस और रामायण में मिलता है उल्लेख

Bhagwan Ram Favorite Food: भगवान श्रीकृष्ण का नाम आते ही माखन-मिश्री और उनकी बाल लीलाएं याद आ जाती हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को भोजन में क्या प्रिय था। रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण में भगवान श्रीराम के जीवन और उनकी दिनचर्या का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों से यह स्पष्ट होता है कि श्रीराम का भोजन उनके जीवन के अलग-अलग चरणों के अनुसार बदलता रहा। राजमहल में उन्होंने राजसी भोजन ग्रहण किया, जबकि वनवास के दौरान पूरी तरह सात्विक और प्राकृतिक आहार अपनाया।

राजमहल में प्रिय था खीर और पंचामृत

अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र होने के कारण भगवान श्रीराम का पालन-पोषण राजसी वातावरण में हुआ। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उन्हें दूध और चावल से बनी खीर तथा पंचामृत अत्यंत प्रिय था। रामचरितमानस के बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास ने राजमहल में परोसे जाने वाले भव्य भोजन का वर्णन किया है

"कनक थार सूचि सुंदर थारी।
बिप्र बृंद जिमि जेवहिं भारी॥
अति बिचित्र बहु भांति रसोई।
जाहि न जाइ बखानी सोई॥"
अर्थात, सोने की सुंदर थालियों में अनेक प्रकार के स्वादिष्ट और विविध व्यंजन परोसे जाते थे, जिनका वर्णन शब्दों में करना कठिन है।

वनवास में अपनाया सात्विक जीवन

जब माता कैकेयी के वरदान के कारण भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला, तब उन्होंने राजसी जीवन छोड़कर ऋषि-मुनियों की तरह सादा और सात्विक जीवन अपनाया। इस दौरान उनका भोजन मुख्य रूप से कंद, मूल और फल रहा।
रामचरितमानस के अरण्यकांड में शबरी द्वारा भगवान श्रीराम को प्रेमपूर्वक फल अर्पित करने का उल्लेख मिलता है
"कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुं आनि।
प्रेम सहित खाए प्रभु बारंबार बखानि॥"
इसका अर्थ है कि शबरी ने भगवान श्रीराम को स्वादिष्ट कंद, मूल और फल प्रेम से अर्पित किए, जिन्हें श्रीराम ने प्रसन्न होकर स्वीकार किया और उनकी सराहना की।

हविष्य अन्न का भी किया सेवन

वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान हविष्य अन्न का भी सेवन किया। हविष्य अन्न वह सात्विक भोजन माना जाता है जिसे यज्ञ में अर्पित किया जा सकता है। इसमें सामान्यतः धान, जौ, गेहूं, मूंग दाल, हरा मटर, तिल, गाय का दूध, दही और शुद्ध घी शामिल होते हैं। इसके अलावा साग, अरबी, शकरकंद, केला, आम, कटहल, गन्ने का रस, हरड़ और सेंधा नमक जैसी प्राकृतिक वस्तुओं का भी सेवन किया जाता था। इस भोजन में लहसुन, प्याज और अधिक मसालों का प्रयोग नहीं होता था। धार्मिक मान्यता है कि हविष्य अन्न मन को शांत, संयमित और सात्विक बनाता है। यही कारण था कि वनवास के दौरान श्रीराम ने सादगी और मर्यादा को अपने जीवन का आधार बनाए रखा।

भोजन से अधिक महत्वपूर्ण था प्रेम

भगवान श्रीराम के जीवन से यह संदेश मिलता है कि उनके लिए भोजन का वैभव नहीं, बल्कि उसे अर्पित करने वाले की भावना महत्वपूर्ण थी। राजमहल में उन्होंने राजसी भोजन ग्रहण किया, जबकि वन में प्रेम से दिए गए शबरी के बेर और साधारण कंद-मूल-फल भी उसी श्रद्धा से स्वीकार किए।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीराम का जीवन परिस्थितियों के अनुरूप सादगी, मर्यादा और संतुलन का उदाहरण है। राजमहल में उन्हें खीर और पंचामृत प्रिय थे, जबकि वनवास के दौरान उन्होंने कंद, मूल, फल और हविष्य अन्न को अपनाया। श्रीराम का जीवन यह सिखाता है कि भोजन की भव्यता से अधिक उसका सात्विक होना और श्रद्धा के साथ ग्रहण किया जाना महत्वपूर्ण है।

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