बिहार

केंद्रीय दांव! बिहार में BJP दोहराएगी छत्तीसगढ़–MP का फॉर्मूला?

Bihar Election 2025 : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) एक बड़े और अप्रत्याशित कदम की तैयारी में है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, भाजपा नेतृत्व अब छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में सफल रहे “केंद्रीय फॉर्मूले” को बिहार में भी दोहराने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।

इस रणनीति के तहत कई केंद्रीय मंत्री और मौजूदा सांसदों को सीधे विधानसभा चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। बताया जा रहा है कि गृहमंत्री अमित शाह को बिहार इकाई से हाल ही में अहम फीडबैक मिला है, जिसके बाद यह प्लान तेजी से आकार ले रहा है।

चर्चित नाम और संभावित सीटें

सूत्रों के अनुसार, पार्टी जिन नामों पर विचार कर रही है, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं- नित्यानंद राय (राघोपुर), गिरिराज सिंह (बेगूसराय), राजीव प्रताप रूडी (छपरा), रामकृपाल यादव (दानापुर), अश्विनी चौबे (बक्सर), सतीश चंद्र दूबे (नरकटियागंज)। बताया जा रहा है कि भाजपा इस रणनीति से एक साथ जातीय समीकरणों को साधने और विपक्षी खेमे पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।

मध्य प्रदेश का अनुभव

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 में भाजपा ने तीन केंद्रीय मंत्रियों और तीन सांसदों को मैदान में उतारा था। नरेंद्र सिंह तोमर ने दिमनी से, प्रह्लाद सिंह पटेल ने नरसिंहपुर से, फग्गन सिंह कुलस्ते ने निवास (ST) सीट से, जबकि सांसद राकेश सिंह, उदय प्रताप सिंह और रिति पाठक ने भी विधानसभा चुनाव लड़े थे। इनमें से ज्यादातर नेता विजयी रहे और भाजपा ने सत्ता विरोधी लहर को मात देते हुए सरकार बनाई थी। इससे जनता के बीच यह संदेश गया कि पार्टी पूरी ताकत से मैदान में उतरी है।

छत्तीसगढ़ का प्रयोग

छत्तीसगढ़ में भाजपा का यह प्रयोग और भी प्रभावी साबित हुआ। पूर्व केंद्रीय मंत्री विष्णुदेव साईं ने कुनकुरी (ST) सीट से जीत दर्ज की और बाद में मुख्यमंत्री बने। केंद्रीय राज्य मंत्री रेनुका सिंह ने भारतपुर-सोनहत (ST) सीट से विजय हासिल की। सांसद अरुण साव ने लोरमी से और गोमती साईं ने पत्थलगांव (ST) से जीत दर्ज की। यह रणनीति भाजपा के लिए शत-प्रतिशत सफल रही। इससे संगठनात्मक मजबूती और केंद्रीय चेहरों की विश्वसनीयता दोनों को बल मिला।

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बिहार में रणनीति के तीन बड़े उद्देश्य

  • बड़े चेहरों का प्रभाव: केंद्रीय नेताओं की मौजूदगी न सिर्फ उनकी अपनी सीट बल्कि आसपास की 10–15 सीटों पर भी असर डालती है।
  • जातीय संतुलन साधना: अलग-अलग समुदायों से नेताओं को उतारकर वोटों के बिखराव को रोकने की कोशिश होगी।
  • मिशन 2029 की तैयारी: लोकसभा और विधानसभा रणनीति को जोड़ते हुए, केंद्रीय नेताओं को राज्य की जमीनी राजनीति से जोड़े रखना और संगठन को मजबूत करना है।

क्या बिहार में दोहराई जाएगी सफलता?

विश्लेषकों का मानना है कि बिहार (Bihar Election 2025) की राजनीति जातीय समीकरणों पर टिकी है। ऐसे में भाजपा अगर बड़े चेहरों को मैदान में उतारती है, तो यह कदम कई स्तरों पर गेम-चेंजर साबित हो सकता है। पार्टी नेतृत्व का विश्वास है कि यह “ऑल आउट स्ट्रैटेजी” महागठबंधन के लिए मुश्किल चुनौती बनेगी और भाजपा को निर्णायक बहुमत की दिशा में आगे ले जा सकती है।

Shweta Gupta

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