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चीन ने दिखाई हवा से लॉन्च होने वाली न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल, पूरा भारत इसकी रेंज में

China JL-1 Air-Launched Ballistic Missile: चीन ने अपनी रणनीतिक वायु क्षमता का प्रदर्शन करते हुए पहली बार H-6N रणनीतिक बमवर्षक विमान से JL-1 (जिंगलेई-1) परमाणु एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल ले जाते हुए फुटेज जारी किया है। इस मिशन में दो J-20 स्टेल्थ फाइटर जेट भी एस्कॉर्ट के रूप में शामिल थे। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार यह केवल सैन्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि संभावित विरोधियों के लिए रणनीतिक संदेश भी है।

क्या है JL-1 मिसाइल की खासियत?

JL-1 को परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम माना जाता है। इसकी अनुमानित मारक क्षमता 8,000 से 10,000 किलोमीटर बताई जा रही है, जिससे चीन की मुख्य भूमि या समुद्री क्षेत्रों से लॉन्च होने पर भारत का पूरा भूभाग इसकी जद में आ सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक यह हाइपरसोनिक री-एंट्री क्षमता से लैस हो सकती है और इसका उपयोग एंटी-शिप तथा लैंड-अटैक दोनों भूमिकाओं में किया जा सकता है।

एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल क्यों अहम है?

पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों के विपरीत, एयर-लॉन्च्ड मिसाइल विमान से छोड़े जाने के बाद बैलिस्टिक मार्ग अपनाती है। इससे लॉन्च पॉइंट बदलने की सुविधा मिलती है और दुश्मन की रक्षा प्रणाली को भ्रमित करना आसान हो जाता है। H-6N को विशेष रूप से ऐसी मिसाइलों के लिए संशोधित किया गया है, जबकि J-20 स्टेल्थ फाइटर सुरक्षा और निगरानी की भूमिका निभाते हैं। यह क्षमता चीन के न्यूक्लियर ट्रायड (जमीन, समुद्र और हवा आधारित परमाणु प्रणाली) को और मजबूत करने का संकेत मानी जा रही है।

भारत और इंडो-पैसिफिक के लिए क्या मायने?

भारत-चीन सीमा विवाद, गलवान और हिंद महासागर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच यह क्षमता भारत की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाना और उन्हें रोकना पारंपरिक खतरों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि भारत के पास वायु और बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली मौजूद है, लेकिन ऐसे विकास पर करीबी नजर रखी जाएगी।

यह प्रदर्शन ताइवान, दक्षिण चीन सागर और भारत के साथ सीमा तनाव के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि JL-1 की वास्तविक परिचालन स्थिति, पेलोड और सटीक रेंज को लेकर आधिकारिक जानकारी सीमित है और विभिन्न रिपोर्टों में इसकी रेंज 8,000 से 10,000 किलोमीटर से अधिक तक बताई गई है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत इस विकास पर नजर रखेंगे, जबकि भारत अपनी लंबी दूरी की स्ट्राइक और एयर डिफेंस क्षमताओं को और मजबूत करने पर ध्यान दे सकता है।

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