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दिल्ली का भलस्वा कूड़े का पहाड़ अब हो रहा खत्म, रोजाना 14 हजार टन तक कचरे की हो रही सफाई

Delhi: दशकों से जमा कचरे से बने भलस्वा लैंडफिल को खत्म करने की मुहिम तेज है। MCD रोजाना हजारों टन पुराने कचरे की बायोमाइनिंग कर उसे अलग-अलग हिस्सों में बांटकर शहर और फैक्ट्रियों तक भेज रही है।

दूर से पहाड़, पास जाकर कचरे का विशाल ढेर

दिल्ली के भलस्वा लैंडफिल की ओर बढ़ते ही सबसे पहले इसकी तेज और भारी दुर्गंध महसूस होती है। झाड़ियों और पुराने ईंट के मकानों के पीछे कचरे का विशाल ढेर राजधानी के क्षितिज पर किसी पहाड़ जैसा नजर आता है। सड़क पर प्लास्टिक, सड़ा हुआ कचरा, कूड़े के ढेर और ऊपर मंडराते गिद्ध इसकी भयावह तस्वीर दिखाते हैं। लैंडफिल के प्रवेश तक पहुंचने पर मौसम के मुताबिक रास्ता कभी कीचड़ से भरा मिलता है तो कभी धूल उड़ती रहती है। सड़क किनारे ट्रक अपनी बारी का इंतजार करते दिखते हैं, जो इस 'कूड़े के पहाड़' का हिस्सा ढो रहे हैं।

70 एकड़ में फैला है कचरे का पहाड़

भलस्वा दिल्ली के तीन बड़े लैंडफिल में से एक है और करीब 70 एकड़ में फैला है। यहां प्लास्टिक पाइप, जूते के तलवे, बैग, कांच की बोतलें, कंक्रीट, कपड़े के टुकड़े और मीट मंडियों से निकला पशु कचरा तक जमीन में बिखरा है। दशकों तक अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में राजधानी से आने वाला कचरा यहां जमा होता रहा और लैंडफिल ऊंचा होता गया। अब MCD इसे समतल करने की कोशिश कर रहा है।

31 जुलाई तक अधिकारियों के अनुसार 99.07 लाख मीट्रिक टन पुराना यानी 'लीगेसी वेस्ट' हटाया जा चुका था। बाकी कचरा 15 अक्टूबर तक हटाने का अनुमान है, जबकि पूरे लैंडफिल को 31 दिसंबर 2026 तक साफ करने का लक्ष्य रखा गया है।

ऐसे हो रही कचरे की बायोमाइनिंग

पुराने कचरे को सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह नहीं ले जाया जा रहा। पहले खुदाई कर कचरा निकाला जाता है, फिर मशीनों से उसकी छंटाई होती है।

हर दिन छांटे जाने वाले कचरे का करीब 65-75 फीसदी हिस्सा बारीक, मिट्टी जैसी 'इनर्ट मटेरियल' होती है। 8-10 फीसदी हिस्सा पुराने निर्माण मलबे यानी Construction and Demolition (C&D) Waste का होता है। बाकी हिस्सा Refuse-Derived Fuel (RDF) होता है, जिसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इनर्ट मटेरियल को नरेला और रोहिणी जैसे दिल्ली के निचले इलाकों में जमीन भरने के लिए भेजा जाता है। RDF को दिल्ली और आसपास के शहरों के पेपर मिलों तथा सीमेंट फैक्ट्रियों में कोयले के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

आग और प्रदूषण का भी बड़ा खतरा

भलस्वा का कचरा सड़ने के दौरान मीथेन जैसी ज्वलनशील गैस पैदा करता है, जिससे आग का खतरा बढ़ता है। अप्रैल 2022 में यहां लगी भीषण आग करीब दो सप्ताह तक जलती रही थी। बाद की एक स्टडी में पाया गया कि आग के दौरान औसत PM2.5 का स्तर 45-55 फीसदी और PM10 का स्तर 40-50 फीसदी बढ़ गया था। मिश्रित कचरे के जलने से जहरीले प्रदूषक और बारीक कण निकलते हैं, जिससे यह इलाका वायु गुणवत्ता और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाता है।

रोजाना आ रहा 4,000 टन नया कचरा

सफाई की रफ्तार मौसम से भी प्रभावित होती है। भारी बारिश में जमीन कीचड़ में बदल जाती है, जबकि तेज गर्मी काम धीमा कर देती है। दूसरी ओर, यहां रोजाना करीब 4,000 टन नया कचरा पहुंचता है, जिसमें ज्यादातर ठोस और जैविक रूप से विघटित होने वाला कचरा है। अगस्त के मध्य में रोजाना 12,000-14,000 टन पुराना कचरा हटाया जा रहा था। एक वरिष्ठ MCD अधिकारी के मुताबिक इस काम पर थर्ड-पार्टी ठेकेदारों के ज्वाइंट वेंचर को करीब ₹400 प्रति टन भुगतान किया जा रहा है। मई 2026 की सरकारी समीक्षा में भी रोजाना करीब 15,000 टन कचरा प्रोसेस किए जाने की बात कही गई थी। तब 70 एकड़ में से लगभग 43 एकड़ साफ हो चुका था और करीब 23.17 लाख मीट्रिक टन पुराना व नया कचरा बाकी था।

2026 तक दिल्ली के बड़े लैंडफिल साफ करने का लक्ष्य

भलस्वा में सफाई अभियान जून 2022 में शुरू हुआ था, तब यहां करीब 73 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा मौजूद था। अब यह दिल्ली के बड़े लैंडफिल सफाई अभियान का हिस्सा है। MCD ने भलस्वा और ओखला को 2026 तक तथा गाजीपुर लैंडफिल को 2027 तक साफ करने का लक्ष्य रखा है। लैंडफिल के अंदरूनी हिस्सों में जाने के लिए MCD मुख्यालय से अनुमति जरूरी थी, इसलिए वहां पहुंच सीमित रही। हालांकि बाहर से ही मशीनों द्वारा कचरे की खुदाई, ट्रकों की आवाजाही और ऊपर मंडराते गिद्ध इस विशाल सफाई अभियान की तस्वीर साफ कर देते हैं। भलस्वा का कचरा गायब नहीं हो रहा, बल्कि उसे खोदकर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जा रहा है और भराव सामग्री, औद्योगिक ईंधन तथा अन्य उपयोगों के लिए भेजा जा रहा है। अब 31 दिसंबर 2026 की समयसीमा यह तय करेगी कि दिल्ली इस 'कूड़े के पहाड़' को खत्म करने की दौड़ में कितनी सफल होती है।

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Tanisha Verma

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