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क्लासरूम में ‘डिजिटल ओवरडोज’; क्यों 85% शिक्षकों का मानना है कि पढ़ाई पर भारी पड़ रही तकनीक

Digital Overdose in Classroom: शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक ने पिछले कुछ वर्षों में अभूतपूर्व बदलाव किए हैं। स्मार्ट क्लासरूम, ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म, डिजिटल असाइनमेंट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टूल्स ने पढ़ाई को पहले से अधिक आसान और सुलभ बनाया है। लेकिन अब इसी तकनीकी क्रांति को लेकर चिंता की आवाजें भी उठने लगी हैं। हाल ही में सामने आए एक सर्वेक्षण में बड़ी संख्या में शिक्षकों ने माना है कि कक्षा में तकनीक का अत्यधिक उपयोग छात्रों की सीखने की क्षमता और एकाग्रता पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। सर्वे के अनुसार लगभग 85 प्रतिशत शिक्षकों का मानना है कि ‘डिजिटल ओवरडोज’ अब शिक्षा व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती बन चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक का उद्देश्य शिक्षा को बेहतर बनाना था, लेकिन जब इसका उपयोग संतुलित तरीके से नहीं होता, तब यह सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि दुनिया भर में शिक्षा विशेषज्ञ अब तकनीक और पारंपरिक शिक्षण पद्धति के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।

क्या है ‘डिजिटल ओवरडोज’

‘डिजिटल ओवरडोज’ का अर्थ है किसी व्यक्ति का जरूरत से ज्यादा समय स्क्रीन, डिजिटल उपकरणों या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिताना। शिक्षा के संदर्भ में यह स्थिति तब पैदा होती है जब छात्र पढ़ाई, होमवर्क, प्रोजेक्ट, वीडियो लेक्चर और मनोरंजन—सब कुछ स्क्रीन के माध्यम से करने लगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार लगातार स्क्रीन पर निर्भरता छात्रों की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा आंखों में थकान, मानसिक दबाव, नींद की समस्या और सामाजिक संपर्क में कमी जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।

शिक्षकों को क्यों हो रही है चिंता

शिक्षकों का कहना है कि तकनीक ने जानकारी तक पहुंच आसान बना दी है, लेकिन इससे छात्रों में गहराई से पढ़ने और समझने की आदत कमजोर होती दिखाई दे रही है। कई छात्र अब उत्तर खोजने के लिए तुरंत इंटरनेट या एआई टूल्स का सहारा लेते हैं, जिससे विश्लेषणात्मक सोच और स्वयं समस्या हल करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। कई शिक्षकों ने यह भी महसूस किया है कि डिजिटल उपकरणों की मौजूदगी कक्षा में ध्यान भटकाने का कारण बन रही है। पढ़ाई के दौरान नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन गतिविधियां छात्रों का फोकस कम कर सकती हैं।

तकनीक के फायदे भी कम नहीं

हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि तकनीक को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। डिजिटल माध्यमों ने दूर-दराज के क्षेत्रों तक शिक्षा पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऑनलाइन पाठ्यक्रम, वर्चुअल लैब, इंटरैक्टिव कंटेंट और डिजिटल लाइब्रेरी ने सीखने के नए अवसर पैदा किए हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान तकनीक ने शिक्षा व्यवस्था को चलाए रखने में अहम भूमिका निभाई थी। यही वजह है कि शिक्षा विशेषज्ञ तकनीक के विरोध की नहीं, बल्कि उसके संतुलित उपयोग की बात कर रहे हैं।

छात्रों पर क्या पड़ रहा है असर

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों और किशोरों में ध्यान की अवधि कम हो सकती है। कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि अत्यधिक स्क्रीन समय नींद की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है, जिसका सीधा असर सीखने की क्षमता पर पड़ता है। इसके अलावा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अत्यधिक निर्भरता के कारण कई छात्र पुस्तकों के साथ समय बिताने की आदत से दूर हो रहे हैं। इससे भाषा कौशल, लेखन क्षमता और गहन अध्ययन की प्रवृत्ति प्रभावित हो सकती है।

क्या हो सकता है समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक और पारंपरिक शिक्षा के बीच संतुलन बनाना सबसे प्रभावी समाधान हो सकता है। स्कूलों में स्क्रीन आधारित गतिविधियों के साथ-साथ पुस्तक पठन, समूह चर्चा, खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। शिक्षकों और अभिभावकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे केवल स्क्रीन पर निर्भर न रहें। डिजिटल उपकरणों का उपयोग सीखने के साधन के रूप में हो, न कि पढ़ाई का एकमात्र माध्यम बन जाए।

भविष्य की शिक्षा कैसी होगी

शिक्षा जगत के जानकार मानते हैं कि आने वाले वर्षों में तकनीक का उपयोग और बढ़ेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वर्चुअल रियलिटी और स्मार्ट लर्निंग टूल्स शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेंगे। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी होगा कि छात्रों में आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और मानवीय संवाद जैसे गुण विकसित किए जाएं। यदि तकनीक को सही दिशा में और सीमित संतुलन के साथ इस्तेमाल किया जाए, तो यह शिक्षा को अधिक प्रभावी बना सकती है। लेकिन अनियंत्रित उपयोग ‘डिजिटल ओवरडोज’ जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है।

तकनीक ने शिक्षा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है, लेकिन इसके अत्यधिक उपयोग को लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं। 85 प्रतिशत शिक्षकों द्वारा व्यक्त की गई चिंता इस बात का संकेत है कि शिक्षा व्यवस्था को अब केवल डिजिटल बनने पर नहीं, बल्कि संतुलित और प्रभावी बनने पर भी ध्यान देना होगा। छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी है कि तकनीक को एक सहायक साधन के रूप में अपनाया जाए, न कि शिक्षा का पूर्ण विकल्प बनाया जाए।

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Lavanya Dayal

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