IIT Bomaby: IIT बॉम्बे, IISER पुणे और IISER कोलकाता के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी कोशिकीय (सेलुलर) प्रक्रिया की पहचान की है, जो लिवर से हानिकारक रक्त वसा (लिपिड्स) के उत्सर्जन को कम कर सकती है, वह भी बिना लिवर में अतिरिक्त वसा जमा किए। यह खोज भविष्य में कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड्स और फैटी लिवर जैसी बीमारियों के उपचार के लिए नई संभावनाएं खोल सकती है।
VLDL रिलीज रोकने का नया तरीका
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तंत्र लिवर से निकलने वाले VLDL (वेरी लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन) के उत्सर्जन को रोक सकता है। खास बात यह है कि यह एंजाइम, रिसेप्टर या जीन को निशाना बनाने के बजाय लिपिड ड्रॉपलेट्स की भौतिक गति को नियंत्रित करता है। IIT बॉम्बे का कहना है कि इस प्रक्रिया को बाधित करने पर लिवर में वसा जमा नहीं होती, जो भविष्य की दवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा लाभ है।
10 साल से चल रहा था शोध
IIT बॉम्बे के बायोसाइंसेज और बायोइंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर रोप मल्लिक की प्रयोगशाला पिछले एक दशक से इस लिपिड-परिवहन प्रक्रिया का अध्ययन कर रही है। उनके अनुसार, पहले के शोध में पाया गया था कि 'काइनेसिन-1' नामक मोटर प्रोटीन लिपिड ड्रॉपलेट्स को कोशिका के किनारों तक पहुंचाता है, जहां VLDL बनते हैं और रक्तप्रवाह में छोड़े जाते हैं।
काइनेसिन-1 और KTDP पेप्टाइड की भूमिका
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि काइनेसिन-1 के टेल क्षेत्र का एक हिस्सा लिवर कोशिकाओं में लिपिड ड्रॉपलेट्स की स्थिति को प्रभावित करता है, जबकि अन्य कोशिकीय अंगों पर इसका असर नहीं पड़ता। यह अंतर लिपिड ड्रॉपलेट्स की अनोखी संरचना के कारण है। जहां अधिकांश कोशिकीय झिल्लियां दोहरी परत (बाइलेयर) से बनी होती हैं, वहीं लिपिड ड्रॉपलेट्स एकल परत (मोनोलेयर) से घिरे होते हैं।
इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने काइनेसिन-1 के टेल क्षेत्र से प्राप्त KTDP नामक एक छोटे पेप्टाइड की पहचान की, जो प्रोटीन को लिपिड ड्रॉपलेट्स से जुड़ने से रोकता है। IISER कोलकाता के सहयोग से किए गए कंप्यूटर सिमुलेशन में पाया गया कि KTDP, लिपिड ड्रॉपलेट्स की मोनोलेयर सतहों से सामान्य बाइलेयर झिल्लियों की तुलना में अधिक मजबूत और स्थिर रूप से जुड़ता है।
चूहों की कोशिकाओं और ज़ेब्राफिश पर परीक्षण
वैज्ञानिकों ने पहले इस पेप्टाइड का परीक्षण चूहों की लिवर कोशिकाओं पर किया, जो स्वाभाविक रूप से VLDL बनाती हैं। इसके बाद शोध में ज़ेब्राफिश का उपयोग किया गया, क्योंकि उनकी लिपोप्रोटीन प्रणाली इंसानों से काफी मिलती-जुलती है। ज़ेब्राफिश के लार्वा लगभग पारदर्शी होते हैं, जिससे वैज्ञानिक माइक्रोस्कोप के जरिए लिपिड्स को बिना नुकसान पहुंचाए सीधे देख सके।
अभी प्रीक्लिनिकल चरण में शोध
यह शोध फिलहाल प्रीक्लिनिकल चरण में है। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में इसकी दीर्घकालिक सुरक्षा, पेप्टाइड डिलीवरी तकनीक और स्तनधारी जीवों में प्रभावशीलता का अध्ययन करना होगा। प्रो. मल्लिक के अनुसार, मौजूदा उपचार कोलेस्ट्रॉल कम करने में प्रभावी हैं, लेकिन ट्राइग्लिसराइड्स घटाने के विकल्प सीमित हैं। उनका मानना है कि यह खोज भविष्य में इस चुनौती से निपटने के लिए नई रणनीतियों का आधार बन सकती है।
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