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ईरान युद्ध से दुनिया में छाई वैश्विक मंदी! जानिए एक्सपर्ट शरद कोहली ने ईरान-US में मीटिंग करवाने वाले पाकिस्तान को लेकर क्या कहा

Iran War Update: अमेरिकी-इज़राल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और खाड़ी क्षेत्र में ईरानी सेना के जवाबी हमलों ने वैश्विक वित्तीय और ऊर्जा बाजारों में भारी उथल-पुथल मचा दी है। इस भू-राजनीतिक संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता, शेयर बाजार में हड़कंप, सप्लाई चेन पर दबा, निवेशकों की चिंता से लेकर सिल्वर-गोल्ड के दामों पर असर पड़ा है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंदी के बादल गहराने लगे हैं। इस बीच न्यूज़ इंडिया 24X7 के पोडकास्ट में डिजिटल हेड डॉ. प्रवीण तिवारी ने अर्थशास्त्री, चार्टर्ड अकाउंटेंट व लेखक शरद कोहली से अलग-अलग विषयों पर सवाल किए और चर्चा की। अर्थशास्त्री शरद कोहली ने बेबाकी से इस युद्ध से पड़ते अलग-अलग क्षेत्रों पर प्रभाव पर अपनी बात रखी और युद्ध के वैश्विक अर्थव्यवस्था से कनेक्शन को अपनी विशेषज्ञता से समझाया। आइए जानते हैं सवालों के साथ-साथ उनके जवाब।

सवाल: ईरान युद्धा का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ने वाला है, इस पर आपका विश्लेषण क्या है?

जवाब:  ये सच है कि इस युद्ध की वजह से दुनिया भर की अर्थव्यवस्था उथलपुथल हुई है और भारत को एक्सेप्शन नहीं है। जहां 87% अगर क्रूड हम बाहर से मंगाते हैं और 60% हम अपनी गैस की रिक्वायरमेंट बाहर से मंगाते हैं और वो स्टेट ऑफ हॉर्मोस को बंद कर दिया जाता है। रास्ते को बंद कर दिया जाता है तो लाजमी बात है उसका असर यहां पर होगा ही होगा। खाली क्रूड और गैस पे देखते हैं। पर आप देखें तो इसका बहुत दूरगामी इफेक्ट है। क्योंकि जो जहाज आते हैं वो खाली क्रूड और गैस लेकर नहीं आते। बड़ा सामान लेके आते हैं।जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स , इलेक्ट्रिकल, मशीनरी और केमिकल्स हो गया। ऐसी बड़ी चीजें आती हैं ईरान से। यहां तक की भारत से ईरान सामान जाता भी है। पीछे करीब 200 बंदरगाहों पर यहां पर सब्जी और फल समुद्र में फेंके गए। क्योंकि जहाज खड़े रहे। इसलिए कि वे युद्ध से डरे हुए और अपनी जान को लेकर जोखिम से आशंकित हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध के चलते शिपिंग कंपनी ने इंश्योरेंस करना बंद कर दिया। एक लंदन में ऑर्गेनाइजेशन है कम लोग जानते हैं उसको इंडेमिनिटी एंड प्रोटेक्शन क्लब कहते हैं वहां उन्होंने आईपीसी बनाया हुआ है बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं और मैंने इसका जिक्र इसलिए किया क्योंकि अविवा प्रडेंशियल ये बड़ी-बड़ी इंश्योरेंस कंपनीज़ जो है इनका हेड क्वार्टर लंदन में है। उन्होंने इंश्योरेंस करना बंद कर दिया शिप्स का या इतनी बढ़ा दी प्रीमियम कि वो आम आदमी के आम एक्सपोर्टर के बस में नहीं रही। तो कुल मिला के उथल-पुथल अब आपका शायद ये पॉडकास्ट एक आध दिन में लाइव हो जाए। आरबीआई के गवर्नर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की जो मीटिंग होती है। उसमें रेपो रेट तो नहीं बढ़ाया गया। पर यह बात वित्त मंत्री ने भी स्वीकार की। यहां तक कि यह बात प्रधानमंत्री जी ने भी स्वीकार की। उन्होंने आग कहा कि जब विश्व में इतने बड़े स्तर पर युद्ध होता है। भले युद्ध क्षेत्र 3000 किलोमीटर दूर हो। तो उसका असर भारत पर आएगा ही आएगा। हम जितना ग्लोबल होंगे उतना ज्यादा असर आएगा। अब देखिए इसके इस इस कॉइन के ना दो साइड हैं। एक तरफ हम ग्लोबल होंगे तो इसका असर आएगा। एक तरफ हम जब ग्लोबल नहीं हैं तो उतने हम इम्यून भी हैं। हम तो अब देखिए हमारा 850 बिलियन डॉलर के करीब का एक्सपोर्ट है। 300 बिलियन डॉलर का डेफिसिट इस बार दिखाई दे रहा है। अब जितनी अर्थव्यवस्था ये अंतरराष्ट्रीय कम्युनिटी के साथ गुथी हुई है। एंटेंग्ड बोलते हैं इसको। उतनी प्रभावित जरूर हो रही है। पर यह भी सच है कि बहुत सारे लोग इनडायरेक्टली भी प्रभावित हो जाते हैं। क्योंकि अब कोई एक्सपोर्टर है तो कोई इंपोर्टर है। उसके साथ कुछ एमएसएमईएस जुड़े हुए हैं। उसके साथ कोई छोटे-मोटे वेंडिंग सप्लाई चेन जुड़ी हुई है। वो प्रभावित होता है। किसी ने मान लीजिए कोई पैकेजिंग मटेरियल सप्लाई करना है। और वो कहता है भैया वहां से माल जा नहीं रहा। वहां से माल आ नहीं रहा तो तुम्हारे पैकेजिंग मटेरियल की हम क्या करेंगे? जबकि उस व्यक्ति का एक्सपोर्ट-इंपोर्ट से कोई लेना देना नहीं है। यह सच है कि महंगाई की आज मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की अनाउंसमेंट जब हुई तो उसमें उन्होंने महंगाई का अनुमान बढ़ा के 4.7 कर दिया इस साल का। जबकि हम पीछे तो ऑलमोस्ट एक से नीचे आ गए थे। आपको याद होगा तो वहां से बढ़ के हम चार पे आ गए। पर अच्छी बात यह थी कि कुछ लोग उस समय जब जीरो के आसपास पहुंच गया था। कुछ लोग चिंता कर रहे थे क्योंकि एक डिफ्लेशन जो है इनफ्लेशन से भी खतरनाक होता है। तो अब ये पॉजिटिव में आ गया पर अब ये तेजी से भाग रहा है और एक और थोड़ी सी चिंता की बात ये है कि इस बार ये जो बारिश हो रही है ना बेमोसम की तो अलनीनो इफेक्ट का भी मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी में जिक्र किया गया। तो ये बारिश मसून जब जल्दी बारिश हो जाती है तो फिर मानसून कमजोर हो जाता है। तो अलनीनो इफेक्ट होता है तो थोड़ा मानसून कमजोर होगा। तो महंगाई का कुछ प्रेशर मुझे अपनी अर्थव्यवस्था पर भारत की अर्थव्यवस्था पर आता दिख रहा है।

सवाल: युद्ध से गहराते ऊर्जा-तेल संकट से निपटने के लिए भारत क्या कर रहा है, वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर चीन और रूस या किसी अन्य देश के साथ हालात को भांपते हुए भारत की क्या रणनीति है?

जवाब: देखिए आप वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी कर सकते हैं पर एक लिमिट तक क्योंकि यहां पर सवाल एनर्जी का है और भारत में मात्र 13% क्रूड बनता है। अब बताइए हम कितनी हम 40 से ज्यादा जगह देशों से ले रहे हैं। ठीक है? हमने नए-नए स्त्रोत ढूंढे जब तक पूरी ग्रीन एनर्जी नहीं होती जब तक फॉसिल फ्यूल्स पे आप डिपेंड कर रहे हैं। तब तक आप इतनी जल्दी कोई वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी नहीं कर सकते। आप ट्रंप साहब के मन बदलने की स्पीड से भी तेज या तो वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी कर लीजिए वो असंभव है। तो मुझे लगता है कि कुछ हद तक हमें यह इंपैक्ट लेना पड़ेगा और आपने बात करी अब बड़ी काम की बात करें कि आम आदमी सोचता है भाई सिकंदर ने पोरस से की थी लड़ाई तो मैं क्या करूं? वो वहां युद्ध हो रहा है होता रहे। मेरे बताइए मेरी अपनी अर्थव्यवस्था पे क्या असर होगा? मेरी जेब पर क्या असर होगा? मेरी रसोई पे क्या असर होगा? मेरे बजट पे क्या? मेरे घर का बजट बिगड़ेगा कि नहीं बिगड़ेगा? तो इसका जवाब है कि कुछ हद तक हां असर पड़ेगा और बहुत सारे लोग मुझे कह रहे हैं कि पड़ रहा है। भले ही दाम कमर्शियल सिलेंडर के ज्यादा बढ़े हो। डोमेस्टिक सिलेंडर का बढ़ा था ₹60 पर वो शुरू में ही बढ़ गया था। वो उसका लड़ाई से कहते हैं कि उसका लड़ाई से संबंध नहीं था। वो पहले से ही बढ़ना लाइन पे था। तय था तो बढ़ा दिया। वो इत्तेफाक था कि वो लड़ाई के बाद उसको उसको बढ़ा दिया गया। कमर्शियल सिलेंडर बढ़ा है। प्रीमियम पेट्रोल बढ़ा है। पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ने की कगार पे थे तो सरकार को जब ऑयल मार्केटिंग कंपनीज पर्दे के पीछे शायद ऐसा हुआ होगा ऑयल मार्केटिंग कंपनीज़ गई होंगी सर ये तो हमारा तो जो $25000 करोड़ का हमने प्रॉफिट इकट्ठा किया था जब क्रूड 6065 पे था तो हम अपने प्रॉफिट बना रहे थे पेट्रोल डीजल तो ऊंची प्राइस पे ही था अब वो प्रॉफिट रिजर्व साहब धीरे-धीरे हमारा हमारा तिजोरी खाली हो रही है हमारे रिजर्व्स इरोड हो रहे हैं तो हमें बचाइए वरना हमें अब कीमत बढ़ानी पड़ेगी लेकिन सरकार ने एक्साइज ड्यूटी जो है वो वापस ली। पर अगर क्रूड यहां से और ऊपर जाता और जाता मैं अभी भी भूतकाल में बात नहीं करूंगा क्योंकि अभी कुछ पता नहीं है। अभी क्रूड आज जब हम बात कर रहे हैं $100 से नीचे आ गया है। तो भारतीय रुपया देखिए ₹95 पहुंच गया था डॉलर के अगेंस्ट। तो अगर यह सब चीजें दोबारा से अह ऊपर उठती हैं, तो हम फिर इम्यूंड नहीं हैं। आपकी बात का मैं सीधा जवाब दूं और मैंने बहुत सारे चैनल्स पे दिसंबर में जब अभी युद्ध का कोई आसार भी नहीं थे। कुछ नहीं था। मैंने यह अह भविष्यवाणी आर्थिक भविष्यवाणी करी थी। मैं कोई ज्योतिषी तो हूं नहीं। ना मुझे पता राहु कहां है ना मुझे पता केतु कहां है ना मुझे मंगल और शनि की दशा पता है। एक बार आपको पता है डॉलर कहां है क्रूड ऑल हां वो मुझे वो मुझे जरूर पता है यही राहु केतु है आजकल के उसके आधार पर मैंने ये भविष्यवाणी की थी कि दुनिया एक मंदी की तरफ बढ़ रही है और मैंने कहा था कि 2026 मंदी का साल रहेगा यह मैंने कहा था क्योंकि मुझे जो अंतरराष्ट्रीय इकोनॉमिक पैराटर्स थे और कोई यह रॉकेट साइंस नहीं है समझना डॉक्टर मैं दर्शकों के लिए बहुत आसान है जो हिस्सा दुनिया का अपने आप को विकसित कहता है। इटली, फ्रांस, जर्मनी, यूके, यूएस। इनको सबको छोड़िए। चलिए यूएस चले जाते हैं। आपको मैं बताऊं अभी एक नया ट्रेंड चला है। मैं आपकी आज पॉडकास्ट से खुलासा करना चाहूंगा। क्या ट्रेंड चला है? दो क्वार्टर अगर लगातार आप तो अर्थशास्त्र बड़ा अच्छा समझते हैं। दो क्वार्टर लगातार अगर कोई अर्थव्यवस्था नेगेटिव जीडीपी दिखाती है उसको ऑफिशियली रिसेशन में मान लिया जाता है। मान लिया जाता है कि ये मंदी में है। और ये तो सबको पता है। आईएमएफ को भी पता है। वर्ल्ड बैंक को भी पता है। निवेशकों को भी पता है। अब ये नया इन्होंने क्या तरीका निकाला ये मैं आपको यूरोप के देशों का बता रहा हूं। उनकी जीडीपी देखिए 0.2% जीडीपी ग्रोथ है। यह तो साफ पता लग रहा है कि डूबते हुए ने किसी तरह अपनी गर्दन पानी के ऊपर बस सांस लेने के लिए टिका रखी है। क्यों? क्योंकि अगर आप रिसेशन में डिक्लेअर अपने आप को कर देते हैं तो क्या होता है? यह जानना जरूरी है ना आपके यहां निवेश आएगा ना आपको ग्रांट्स मिलेंगी ना आपके यहां टूरिस्ट भी आना बंद हो जाएगा आपके यहां जितनी मैन्युफैक्चरिंग डीलिंग ट्रेड डील्स सब खत्म हो जाएंगी आपके यहां लोग माल बेचने नहीं आएंगे यहां तो सेल ही नहीं है यहां तो पहले ही तुम मंदी में हो मंदी का कोई हाथ नहीं पकड़ता है मंदी वाले का लोग चढ़ते सूरज को सलाम मारते हैं ये तो मानते हैं आप डूबते हुए को कोई नहीं मारता है तो इसलिए अब ये नया ट्रेंड चल पड़ा बड़ा खतरनाक ट्रेंड है। ये बड़ी मैं आपको ऐसी बात बता रहा हूं जो शायद कोई अर्थशास्त्री दुनिया में बताएगा नहीं क्योंकि हम जब हम जब विश्लेषण करते हैं तो हम वहां नौकरियां कितनी पैदा हो रही हैं? वहां पर दुकानों की सेल कितनी है? वहां पर निवेश कितना आ रहा है? वहां पर टैक्स कलेक्शंस कितनी है? ये जब आंकड़े आप अलग-अलग देखेंगे ना तो आपको रिसेशन दिखाई देगा। पर वो डिक्लेअर किया जाता है। अमेरिका में जुलाई सितंबर में 4.4% जीडीपी दिखाई। अक्टूबर से दिसंबर में 1.4 आ गई। पर अब जनवरी से मार्च आने दीजिए। यह बात और है कि ये मैनिपुलेशन लोगों ने चाइना से सीखी क्योंकि चाइना अपने यहां का अब देखिए मैं किसी वित्त मंत्रालय के कॉरिडोर में जाके उसके आंकड़े तो खंगाल नहीं सकता। चाहे मैं आईएमएफ हूं, चाहे मैं वर्ल्ड बैंक हूं। मैं अपने डाटा को मैनिपुलेट कर सकता हूं। इतना तो दिखा सकता हूं कि भाई मैं रिसेशन में नहीं हूं। तो ये एक खतरनाक ट्रेंड है। मेरे हिसाब से जो दुनिया का हिस्सा अपने आप को विकसित कहता है वो ऑलरेडी मंदी में है।

सवाल: राष्ट्रपति ट्रंप का 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' के जरिए अमेरिका में नौकरियां पैदा करने का सपना था। लेकिन उनके हालिया कदम बताते हैं कि किस तरह तेजी से डाउनफॉल आ रहा है? उनका युद्ध के लिए कदम अचानक कैसे?

जवाब: नहीं अभी अभी कोई ऐसा ऐसी कोई एजेंसी नहीं है। आपको अपने आंकड़े सही देने के लिए मजबूर करे। पहली बात अगर मैं कह रहा हूं मैं 0.2% पे हूं तो आपको मानना पड़ेगा। मैं रिसेशन में नहीं बता दो कि आप क्या हो और जहां तक बात है मुंह उठाया युद्ध पे चल गए तो सुनते कहां है किसी की वो उनके और उनके इर्दगिर्द जो लोग बैठे हैं उनके हमने कई दफे नाम लिए आपके शो पे भी मैंने नाम लिए थे उनके वो सिर्फ यस मैन बन के रह गए और एक दो लोगों ने वो कैश पटेल साहब हैं तुलसी गबाड़ है देखिए उन्होंने पीछे युद्ध के लिए इनडायरेक्टली कुछ इशारा किया तो उनके नाम आ गए फोटो ये उन हिट लिस्ट में है टारगेट में निकाले जाने की तो मुझे लगता है यह कॉलोनियल एरा में चले गए हैं जब हुआ करता था ब्रिटिश टाइम आप अगर हिस्ट्री पढ़ेंगे तो उठते थे वो अपना शिप उठाई गोरे वहां पर और चलो आज आज अफ्रीका के इस देश पे अपना कब्जा करेंगे वहां गए इनके पास गंस होती थी दूसरों के बेचारों के पास तीर कमान होती थी या तलवारें होती थी अब गन के सामने तीर कमान कहां टिकेगा उठाए तोप उठाई वहां पर दो-तीन दो-तीन गोले दागे चलो भाई आज से हमारा वो आके पैर सर आपके बाय द वे यह सर शब्द जो है ना यह अमेरिका से आया है और यूके से आया है और सर का मतलब जो लोग नहीं जानते स्लेव स्लेव आई रिमेन। दिस इज व्हाट सर मीन्स। कल को आप किसी को सर कहें तो याद रखिएगा स्लेव आई रिमेन। मैं आपका बंधुआ मजदूर रहूंगा। ये सर का मतलब है। तो उपाधि दी जाती है। वो उपाधि देते हैं। आप सोचिए वो आपको नाइटहुड देते हैं या आपको सर कहलाते हैं उसका वो वो जो उपाधि लेने वाला बेवकूफ है। उसको उसको पता अगर वो पता लगेगा ना सर का मतलब क्या है? तो वो जो नाइट नया है ये बिल्कुल। अच्छा आपको नहीं मालूम। बिल्कुल लोगों को जानना चाहिए। जब आप सर किसी को कहते हैं मत कहा करिए आप उसके बंधुआ मजदूर होना स्वीकार एस आई आर स्लेव आई रिमेन ये यूके से आया तो ये उस एरा में चले गए हैं सर वाली जहां गए वहां पर अपना झंडा गाड़ दिया मैं कभी मुझे क्यूबा चाहिए अब मुझे ग्रीनलैंड चाहिए अब मुझे ईरान चाहिए कनाडा भी चाहिए कनाडा चाहिए तुम मेरे 52वीं स्टेट में बन जाओ ना उनको कहते हैं हेलो गवर्नर अरे तो मुझे लग रहा है ये ये ये पीछे चले गए हैं 100 200 साल पहले जब इस तरीके से देश जाके पे कब्जा किया करते थे। आपने जो सवाल पूछा उसका जवाब दे रहा हूं। और जहां तक सलाह मशवरा करने वाले के सलाह मशवरा देने वाले लोग हैं। 60% अमेरिका के लोग इनके साथ नहीं है। इनकी अप्रूवल रेटिंग गिर चुकी है। ये जमाना बदल चुका है। हर देश की संप्रभुता हर देश की सोवनिटी उसको प्यारी है। आप किसी पे हमला करके देखिए। आपने ईरान जैसे देश पे हमला किया। देखिए आपको क्या मुंहत जवाब दिया है उसने। आपको हिला के रख दिया उसने। आपके अमेरिकन आप मानेंगे नहीं। मेरे बहुत सारे मित्र हैं मिडिल ईस्ट में। बहरीन में, कतर में। इन सब देशों में मैं गया हुआ हूं। कुवैत में इन सब जगह मेरे मित्र हैं। मेरे उनसे लगातार फोन से बात होती रही। कहते हैं अमेरिकन सैनिक बेस छोड़कर होटलों में रहे। उन होटलों में बाकी गेस्ट को भागना पड़ा कि क्योंकि अब जैसे छूत की बीमारी लगती है। भैया भाग जाओ इस पे कल। मिसाइल गिरेगी। होटल मैनेजमेंट ने कहा चले जाओ भैया। यहां अमेरिकन सैनिक आ गए। आप चले जाओ क्योंकि अब यह हिट लिस्ट पे आ गया है। शर्म की बात है जो अपने आप को सुपर पावर कहता है उसको ऐसा ऐसा जवाब दिया कि आज उनको बैकफुट पे आना पड़ा। एक बार नहीं कई बार बैकफुट नईनई डेडलाइन दो दिन देता हूं, पांच दिन देता हूं, 10 दिन देता हूं। अरे जो गरजते हैं वो वो बरसते नहीं। एक और जो बरसते हैं वो गरजते नहीं।

सवाल: ईरान-अमेरिका के बीच पाकिस्तान मध्य मध्यस्थता कर रहा है। क्या भारत ने ट्रंप को तवज्जो नहीं दी इसलिए अब अमेरिका का पाकिस्तान की तरफ झुकाव हो रहा है?

जवाब: हम लोग पेट्रोल डीजल बोलते हैं। हम लोग लीटर में नापते हैं। अमेरिकी इसे गैस बोलते और इसे गैलन में नापते हैं। इनके प्राइसेस वहां बढ़ चुकी हैं। अब उनको बेचैनी हो रही है। भारत में नहीं बढ़ी। अरे भाई हम दुनिया के सबसे बड़े ऑयल प्रोड्यूसर। अब दिक्कत उनके सामने यह थी कि टेक्सेस में मैं गया हूं हिस्टन में। वहां पर डब्ल्यूटीआई कैटेगरी का क्रूड बनता है जिसको वेस्टर्न टैक्सेस इंटरमीडिएट कहते हैं। इसमें सल्फर ज्यादा होता है। इसकी रिफाइनिंग कॉस्ट थोड़ी सी ज्यादा आती है और इसकी आउटपुट भी कम होती है। जामनगर की हमारी रिफाइनरी इसको कर लेती है। अब सप्लाई की कमी नहीं है अमेरिका में। जो शेल टेक्नोलॉजी यूज़ करते हैं। सप्लाई की कमी नहीं है। पर दिक्कत यह है कि क्रूड ऑयल की प्राइस तो तय होती है कॉमिक्स पर कमोडिटी मार्केट में या ओपेक तय करता है। तो अपने यहां महंगाई तो झेल रहे हैं ना। सप्लाई की प्रॉब्लम नहीं है पर महंगाई की अब और आपको सच बताऊं ये जो सीज फायर के पीछे डोमेस्टिक अमेरिका की महंगाई एक बहुत बड़ा कारण रहा है। क्योंकि इसकी वजह से उनका वोटर बेस धीरे-धीरे धीरे-धीरे करके मागा का बेस भी इरोड हो रहा है। अमेरिका में क्या है कि अमेरिका में तनख्वाह मिलती है वीकली। हम लोग तो यहां मंथली तनख्वाह लेते हैं। वहां वीकली मिलती है। और आम अमेरिकन की एक हफ्ते की तनख्वाह आने से पहले उनके खर्चे निर्धारित हो जाते हैं। अगर मुझे $500 मिलने हैं। उसको पता है $375 मेरी मकान की किस्त जानी है। मेरा $475 मेरा ग्रोसरी का बिल है। $200 मैंने घूमने के देने हैं। $300 के मैंने दारू पीनी है। वगैरह-वगैरह। और जैसे ही यह बजट बिगड़ता है तो आम अमेरिकन को क्षमा करेंगे। मैं बुरी बात नहीं कहना चाहता पर उनको सेविंग वेविंग ज्यादा समझ नहीं है। दूसरा 65% अमेरिका की आबादी स्टॉक मार्केट्स में इन्वेस्टेड है। भारत में तो हमारे डीममेट अकाउंट 202 करोड़ है। एक्टिव जो हमारे इन्वेस्टर्स हैं शायद इससे आधे ही होंगे। आधे भी नहीं है। अमेरिका में 65% लोग अगर 35 करोड़ अमेरिका की आबादी है तो 65% लोग शेयर मार्केट से जुड़े हुए हैं। अब हुआ क्या कि जैसे-जैसे क्रूड की प्राइस बढ़ रही थी, अमेरिका की शेयर मार्केट भी गिर रही थी। उन्होंने कहा यार और अमेरिका में एक लॉबी है वॉल स्ट्रीट में जिसने जब से ट्रंप साहब आए हैं वो लॉबी स्टॉक मार्केट में पैसा पंप कर रही है। उसको आर्टिफिशियली उठा रही है। क्यों मैं ये कह रहा हूं क्योंकि अमेरिका के जो फंडामेंटल्स हैं अर्थव्यवस्था के वो शेयर मार्केट की चाल के साथ मैच नहीं कर रहे हैं। डॉऊ jos है, nstc है, snp है जितनी भी इंडाइसेस हैं वो [गला साफ़ करने की आवाज़] सब ऊपर जा रही हैं और अर्थव्यवस्था नीचे जा रही है। तो शेयर मार्केट शॉर्ट टर्म में ऊपर नीचे जाए समझ आता है। पर लॉन्ग टर्म में शेयर मार्केट को फंडामेंटल्स के साथ मैच करना होता है। करती है। तो अब इनको लगा कि क्रूड ऑयल प्राइस बढ़ रही है। एक तरफ महंगाई बढ़े जा रही है। हमारी शेयर मार्केट डाऊ ने गिरना शुरू कर दिया। इनको हो गई चिंता कि ये तो मैं तो राष्ट्रपति नहीं रहूंगा। अगर मैं अगर मैं मिड टर्म हार गया तो ये सेनेट वाले और कांग्रेस वाले तो मुझे निकाल के इंपीच कर देंगे। मुझे बाहर कर देंगे। तो यह यह इसके पीछे के पर्दे के पीछे का यह खेल है। ऊपर से सोने पर सुहागा एपस्टीन। अब एस्टीिन की फाइल्स आई जो जिन लोगों ने मैंने पढ़ी है पूरी मतलब पढ़ी ऐसी है कि मेरे शर्म से पानीपानी जिसको कहते हैं हो जाना। वो आप शर्म से पानीपानी पढ़ने वाला अगर ना हो जाए तो मैं गारंटी करता हूं इस बात की। तो ये दो-तीन मुद्दे ऐसे थे कि इनको इनको युद्ध में उलझना फिर युद्ध में फंस जाना फिर पलटी मारना। तो ये सब वहां से निकल तो इनको लगा कमिंग बैक टू योर क्वेश्चन। इनको लगा कि मोदी जी मेरे पैर पर क्यों नहीं झुके? भारत मेरे आगे झुका क्यों नहीं? अब भारत में सडनली स्पाइन आ गई। आज तक तो नहीं थी। मतलब रीड की हड्डी आ गई। पहले नहीं हुआ करती थी। तो ये इस वजह से इन्होंने पाकिस्तान को पोक करना शुरू किया। तो आपने बिल्कुल ठीक बात जो जो बात आपने पकड़ी मैंने उसी को खोल दिया।

सवाल: अमेरिका ने हार्ड वर्क करके अपनी इकोनॉमी को मजबूत नहीं किया जैसे भारत ने कृषि प्रधान बनकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया तो क्या अब दुनिया भर में अमेरिका का प्रभुत्व कम हो रहा है या अपने प्रभुत्व को कायम रखने के लिए ऐसी चालें चली हैं?

जवाब: मुझे लगता है ये अब कुछ भी चाल चले वो प्रभुत्व अब वो कभी भी नहीं हो पाएगा। और पार्टनर मी फॉर सेइंग दिस अमेरिका विल नेवर बी द सेम अगेन। अब जहां तक आपका पहला हिस्सा था कि बिना मेहनत किए ये 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन गए। इतनी अर्थव्यवस्था बन गए कि जिन लोगों ने इन पे राज किया जिन लोगों ने अमेरिका को भाषा दी ब्रिटिश का राज था। आप जानते हैं वो इनके आगे हाथ जोड़ के खड़े हो गए। मतलब अपने जो मास्टर्स थे वो भी स्लेव बन गए कि उनके प्राइम मिनिस्टर को कभी स्टूपिड कह देते हैं। कभी कुछ कह देते। आपने देखा होगा कभी फुलिश कभी डिगो गार्शिया को लेके। कभी कुछ कह देते हैं, कभी कुछ कह देते हैं। देखिए मैं वैसे तो अर्थशास्त्री हूं पर मैं फिलॉसफी और अपने जो हिंदुस्तानी कल्चर है और जो हमारा हिंदुस्तानी विद्या की परंपरा है उसको बहुत फॉलो करता हूं। उसमें एक शब्द होता है प्रारब्ध। आपने सुना होगा। उसको आम भाषा में किस्मत कह देते हैं। तो इन लोगों की किस्मत अच्छी थी। के किस्मत अच्छी थी तो माइक्रोसॉफ्ट बन गया। Google बन गया। अल्फाबेट कहते हैं जिसको आजकल Amazon बन गया। कुछ नहीं तो बर्गर से McDonald निकल आया और लोगों को लोगों को सोडा पिला पिला के कोका कोला पेप्सी बन गई। हथियारों का कारोबार हथियारों का कारोबार हो गया और ये ब्रांड्स इनकी किस्मत देखिए किस्मत का खेल है। आपने वाकई ये बात ठीक है कि इतनी मेहनत इन्होंने नहीं करी। वो आलू टमाटर की जगह पूरी दुनिया में फैल गया। आलू टमाटर आप दुनिया में सब जगह मिलते हैं। मैंने पूरी दुनिया कई बार घूमी है। आलू टमाटर मैं इसलिए बोल देता हूं क्योंकि मुझे शायद ही कोई देश मिला जहां आलू टमाटर नहीं मिले। तो वो सब जगह जाके आलू टमाटर बन गया। तो उससे इनकी अर्थव्यवस्था तभी तो मुझे जब आपके साथ मैं टेरिफ पे डिस्कशन करता था तो मैं यही बात बोलता था कि भाई आपके पास तो पहले ही प्रभुत्व है इन ब्रांड्स के जरिए। आपकी हमारी जो बातचीत है आज अगर हमें कोई देख रहा है तो शायद इनमें से किसी ब्रांड की वजह से देख रहा है। क्षमा करें। इस ब्रांड की वजह से शायद लोगों तक हम पहुंच रहे हैं। तो ऐसे ब्रांड तो आपको अब इसके ऊपर मैन्युफैक्चरिंग भी अपने यहां चाहिए। आप मैन्युफैक्चरिंग नहीं ला सकते क्योंकि आपके यहां कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन ऐसी है। हमने सर्वे किया हुआ है। फैक्ट्री नहीं आपके अपने यहां का बना हुआ iPhone $300 का आपके यहां पड़ेगा। अगर आप बनाते हैं। बाहर आप बनाते हैं, इंडिया में बनाते हैं, चाइना बनाते हैं, वो $1000 का पड़ता है या $800 का पड़ता है। अब आप पीछे पड़ गए। नहीं, मुझे तो अपने यहां मैन्युफैक्चरिंग चाहिए। मुझे आप 80 साल के हो गए। तो आप 80 साल में अब जो सोच है वह रखनी पड़ेगी ना। आप अगर पुरानी सोच रख के चलेंगे जब आप 35 साल के थे कि तब फैक्ट्रियां हुआ करती थी अमेरिका में। हां हुआ करती थी। पर वो जमाना लद गया। इस तरीके से कॉस्ट बढ़ी तो मुझे लगता है आपके बात की सीधी जवाब दूं। इनकी किस्मत अच्छी थी। पर अब जो आने वाला समय है पीछे की छोड़िए अब जो हो गया सो हो गया। अमेरिका का डाउनफॉल मेरे हिसाब से शुरू हो चुका है और डॉलर यहां से अभी डॉलर में आपने जरूरी है ये बात करना डॉलर के बारे में क्योंकि अमेरिका की जो जितना बादशाहत है ना जी जो दादागिरी है दबदबा है रुतबा है वर्चस्व है सुप्रमेसी है बोलता जाऊंगा मैं वो आधे से ज्यादा डॉलर की वजह से है और डॉलर आपने देखा कि एक डॉलर इंडेक्स होता है उसमें छह करेंसीज आती हैं। मुझे लगता है NS इंडिया 247 के सारे फॉलोअर्स व्यूअर्स सब्सक्राइबर्स को डॉलर इंडेक्स जानना बहुत जरूरी है। बड़ी काम की चीज है ये। इसमें छह करेंसीज होती है। जैपनीज़ यन, ब्रिटिश पाउंड, यूरो, स्विस फ्रैंक, कनेडियन डॉलर और स्वीडिश क्रोमा। ये छह करेंसीज मिला के एक बास्केट बनती है। उसको डॉलर इंडेक्स बोलते हैं। इसके खिलाफ डॉलर को नापा जाता है। हुआ क्या कि क्रूड ऑयल की जब कीमत चढ़ी तो डॉलर की डिमांड बढ़ गई। डॉलर का मजबूत होना और डॉलर की डिमांड होना दो अलग-अलग चीजें हैं। भारतीय रुपए के खिलाफ डॉलर मजबूत नहीं हुआ। भारतीय रुपए के खिलाफ रुपया कमजोर हुआ है क्योंकि डॉलर की डिमांड बढ़ गई क्योंकि एफआईआई पैसा निकालने लगे। क्रूड ऑयल के लिए हमें ज्यादा डॉलर देने पड़े। उसकी वजह से डॉलर के जब किसी चीज की डिमांड बढ़ती है तो उसकी कीमत बढ़ती है। कीमत बढ़ना और इंट्रिंसिक वैल्यू की मजबूती दोनों अलग-अलग चीजें हैं। ये मैं ये मैं समझाना चाहता था। तो अगर आप इस बात को सुनकर कोई कहे कि डॉलर कहां कमजोर हुआ? डॉलर तो दुनिया भर में मजबूत हो गया। देखो भारतीय रुपए के खिलाफ ₹5 पहुंच गया था। तो यह कहां यह कहां डॉलर डॉलर आंतरिक रूप से कमजोर हो रहा है और जैसे ही युद्ध के बादल छटेंगे जैसे ये क्रूड ऑयल का जो संकट है इससे डॉलर अपने आप को डिसोसिएट करेगा आप देखेंगे डॉलर यहां से डॉलर की जो आगे की जर्नी है वो नीचे को है और डॉलर का वर्चस्व मात होगा। यहीं से बात निकल के आती है जो लोग क्योंकि आजकल लोग गोल्ड सिल्वर पे बहुत सुनना चाहते हैं। तो डॉलर का ये जो आपको गोल्ड सिल्वर पे दबाव दिखाई दिया युद्ध के दौरान जबकि युद्ध में गोल्ड सिल्वर ऊपर जाना चाहिए। तो डॉलर इंडेक्स की वजह से इनकी बॉन्ड यील्ड्स इनके यहां 10 साल और 30 साल के बॉन्ड बड़े मशहूर हैं और दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं ने उसमें निवेश किया हुआ था। अरे छोड़िए इनके यहां जमीन से करीब मेरे हिसाब से 25-50 मीटर नीचे एक इन्होंने तिजोरी बनाई हुई है फेडरल रिजर्व के नीचे। वहां पर यूरोप के देशों में उन्होंने अपना सोना रखा हुआ है सेफ्टी के लिए। पहले लंदन में रखते थे। जब से लंदन की हालत डगमगाई तो इन्होंने वहां रखना शुरू किया। वो सोना फ्रांस ने कल वापस मंगाया अपना सवा50 टन सोना। धीरे-धीरे देश वो सुना क्योंकि उनको विश्वास ही नहीं रहा कि भैया इनका तो पता ही नहीं है तो कभी कुछ करते हैं कभी कुछ करते हैं। तो अमेरिका के ऊपर से दुनिया भर के देशों का विश्वास उठ रहा है। इनके ट्रेजरी बॉन्ड्स में किसी देश ने 200 बिलियन डॉलर, किसी देश ने 300 बिलियन डॉलर, किसी देश ने 700 बिलियन डॉलर मेरे पास पूरी लिस्ट है उन देशों की जिन्होंने इनकी अर्थव्यवस्था में निवेश किया हुआ था। उन्होंने धीरे-धीरे पैसा वो निकालना शुरू किया है और लगातार वो पैसा वहां से जा रहा है और वो पैसा गोल्ड सिल्वर वो पैसा गोल्ड सिल्वर में लगाया जा रहा है। अब अमेरिका पे से तो अमेरिका तो मैंने जब आपको कहा ना कि लद गए इनके दिन तो उसके पीछे पूरी एक कहानी है।

सवाल: बतौर कंपनी अमेरिका ने अपने आप को ब्रैंड बनाया और लोगों का विश्वास जीता लेकिन क्या बाजार में अमेरिका अपना विश्वास खो रहा?

जवाब: इस पडकास्ट के माध्यम से मैं उम्मीद करता हूं आपकी यह पडकास्ट अमेरिका में रह रहे लोगों तक भी शायद पहुंचेगी। कोई ना कोई इसको जरूर शेयर करेगा या आपके फॉलोअर्स भी और सब्सक्राइबर्स में से लोग अमेरिका में होंगे। मैं उनको आज आपकी पडकास्ट के माध्यम से एक सलाह देना चाहूंगा। सलाह यह देना चाहूंगा अगर आप वहां बसे हुए हैं। सालों से आपके दादाजी पापा आए थे। दादाजी आए थे। जो भी आए थे वहां पर आप वहां पढ़े लिखे आपने वहां अपना बिजनेस शुरू किया। बैंक अकाउंट खुलवाए, वेल्थ बनाई। मैं आपको सलाह दूंगा धीरे-धीरे बोरी बिस्तर बांधना शुरू कर दीजिए। क्योंकि किसी देश से उखड़ के दूसरे देश में आना कोई ओवरनाइट काम नहीं होता। ऐसा ना हो कि आपको ओवरनाइट आना पड़ जाए और आपकी वो सारी वेल्थ जो आपने आज तक कमाई थी वहीं की वहीं रह जाए। क्योंकि अगर आपको जबरदस्ती आना पड़ा तो सब छोड़ के आना पड़ेगा। अपनी मर्जी से आएंगे तो प्रॉपर ऑर्गेनाइज करके यहां ला के निवेश करेंगे। यहां आ जाइए। दिस इज द फ्यूचर। अगले 10 साल भारत के हैं। इस देश का आगे कुछ नहीं होना। हम तो डूबेंगे सनम। तुम्हें भी ले डूबेंगे। ये ये जो आपने सलाह दी है इसके पीछे की कुछ वजह भी वैसे तो आपने पूरा पडकास्ट ही कई वजह बताई हैं कि धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। कोई ऐसी वजह बताएं कि वो उनको इंपैक्ट करें और लगे कि हां जो शरद जी सलाह दे रहे हैं इस पर विचार करना। नहीं ये तो देखिए जो लोग अमेरिका में रहते हैं अह मुझसे मुझसे कम नहीं तो मुझसे बराबर नहीं तो मुझसे बेहतर वो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को समझते हैं। मुझे बताइए क्या बात जो पहले थी वो अब है? जो अमेरिका आप अपने सपनों का लेके आए थे। अमेरिकन ड्रीम जिसको कहा जाता है। क्या वो ड्रीम अब रह गया है? इसका जवाब है ना। वहां पर जो कानून बन गए आइस आईसीई जो सारा मुहिम चलाए गए। लोगों को पीट-पीट के वहां से भगाया गया है और अब वहां इतने डॉलर कमाने को रह भी नहीं गए हैं। लोग जाते थे डॉलर कमाने। वो लोग मेरे से यहां से कहते थे कि के यू नो जो लाइफ वहां पर है यू नो वी डोंट गेट दैट लाइफ हियर। और लोग बच्चों के लिए जाते थे। मैं आपको बड़ा इंटरेस्टिंग एक वाक्य सुनाऊंगा। पडकास्ट मेरे मन में चल भी रहा था। इनफैक्ट जिस पॉइंट पे आप आए हैं। बच्चों के लिए एजुकेशन बहुत अच्छी है। मैं मेरे मित्र के यहां गया न्यूयॉर्क में। कुछ साल पहले की बात है। 9 साल का उसका बेटा था। सुबह स्कूल जाने का वक्त था। मुझे ब्रेकफास्ट पे इनवाइट किया गया था। बताना जरूरी छोटा सा किस्सा है पर ये आपको कहानी बता देगा। 9 साल का बच्चा ब्रेकफास्ट का टाइम मैं टेबल पे उसके पिता बैठे थे। बच्चा बैठा था। मैं बैठा था। माता श्री बच्चे की किचन में ब्रेकफास्ट तैयार कर रही थी। बच्चे के स्कूल जाने का टाइम था। यूनिफार्म पहनी हुई थी। उसको पिकअप करने के लिए गाड़ी आने वाली थी। उसने माता ने लाके दूध रखा टेबल पे। हिंदुस्तानी बच्चा था। दूध पियो। कहते हैं घर में दूध पियो। नो मॉम। आई डोंट वांट टू हैव मिल्क। उसने कहा पापा ने कहा क्यों नहीं पिएगा? पीना पड़ेगा बिल्कुल यू हैव टू टेक द सनी। और सनी से नो नो नो नो नो नो नो आई डोंट वांट टू हैव मिल्क टुडे। उसने कहा भाई भाई दूध पिएगा तो तुम्हारी हड्डियां बनेंग जो हम कहते हैं बच्चों को भाई ये दूध बच्चों के लिए जरूरी होता है। अब उधर से माता श्री आई उन्होंने उठा के उसको डांट दिया। ये ये मैं साथ ही बैठा हुआ था। मैं ब्रेकफास्ट पे आया हुआ था। सनी हाउ डे यू से नो यू विल हैव टू हैव मिल्क। वो बच्चा उठा मेरे आंखों के सामने मेरे दाएं तरफ उनका फोन रखा था उसने गया उसने 911 डायल कर दिया साहब 10 मिनट के अंदर वहां पुलिस आ गई और उनको उठा के ले गई खैर वो एक आध दिन में मामला बड़ी मुश्किल से सुलटा तो मैं वापस उनके साथ नाम नहीं बता सकता यहां मैं वापस गया मैंने कहा ये बताइए आप अमेरिका कब आए थे कहते 12 साल हो गए मैंने किस लिए आए थे कहते बच्चों के लिए ये बनाने के लिए मैंने कहा आपने क्या बच्चों को बना दिया कहते हैं बच्चे ना सिस्टम के हो जाते हैं मैंने कहा सिस्टम के हो जाते हैं आपको जेल भिजवा देते हैं बच्चे आप बच्चों बच्चों में यह संस्कार था। नहीं इसमें तो हमारे अपने मैंने कहा क्या संस्कार है? जिस स्कूल में वो जाता है वहां उसको यही सिखाया जाता है कि अगर मां-बाप तुम्हें डांटे तो पुलिस बुला लो। 911 डायल कर दीजिए। कैन यू बिलीव अ नाइन ईयर ओल्ड गेटिंग देयर पेरेंट्स अरेस्टेड? एक दूध पीने के लिए कह रहे थे। तो मेरा मतलब है कि आपके सवाल का सीधा जवाब दो। जो लोग वहां बैठे हैं। अब चलिए इन बातों को तो वो लोग इग्नोर करते हैं। ये भी इग्नोर करते हैं कि उनको अपने बर्तन खुद धोने पड़ते हैं। कपड़े खुद धोने पड़ते हैं। यहां तो तीन-ती चार-चार घर में नौकर चाकर होते हैं। इन सब बातों को भी छोड़ दीजिए। बट आपका जो अमेरिकन ड्रीम है दैट ड्रीम इज गोइंग टू क्रैश नाउ। इसलिए मैं यह सलाह दे रहा हूं कि बेहतर है अपनी मर्जी से आप आएंगे तो आप सब कुछ ऑर्गेनाइज करके इंडिया में इन्वेस्ट करेंगे। कोई बिज़नेस शुरू करेंगे, नौकरी शुरू करेंगे। अच्छा सा एक घर लेंगे। अरे आपने अगर अमेरिका में पैसा कमाया तो यहां तो यू कैन लिव लाइक लॉर्ड्स।

सवाल: युुद्ध वहां चल रहा है लेकिन इसका हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ये बताए कि यह हालात कैसे एक-दूसरे जुड़े हुए या निर्भ हैं?

जवाब: इसका यहां इंपैक्ट होगा। कोई भी देश आज के युग में ना सारी चीजें अपने यहां बना सकता है। सारी चीजें कहे कि अपने यहां आप कंज्यूम कर सकता है। आपको विदेशी मुद्रा भी चाहिए। आपको इंपोर्ट भी चाहिए। आपको एक्सपोर्ट भी चाहिए। आपको फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट भी चाहिए। आपको फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स भी चाहिए। ये सब चीजें हमें चाहिए। पर यहां बात तो अमेरिका की हो रही थी ना। बात तो हो रही थी कि अमेरिका क्या वही अमेरिका है जो पहले था और आगे आने वाला समय अमेरिका के लिए कैसा है? 130% इस देश के ऊपर उधार है। अमेरिका की बात हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह सारी प्रॉब्लम की जड़ वहीं है। मैंने तो बात शुरू करी थी एक व्यक्ति से याद है। जब पहला सेंटेंस मैंने बोला किसी एक व्यक्ति की वजह से आज हम इस उथल-पुथल में डले हुए हैं। इसलिए मुझे उसका जिक्र खोल के करना जरूरी था। 130% डेप्ट टू जीडीपी रेश्यो है। 30 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी के अगेंस्ट 39 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है। खोखली हो चुकी है अर्थव्यवस्था। खाली नाम की अब रह गई है वो। आप दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाइए। चार-पांच टाइम ज़ोंस हैं वहां पर। आप जाके लोगों से बात करिए। क्या वही अमेरिका है जब आप आए थे तो वैसा था। वो कहेगा नहीं ऐसा नहीं है। अब तो बस ये है। होता क्या है? मैं बताऊं आपको। लोग यहां से जाते हैं ना। बुरा मत माने कोई। जब यहां से लोग जाते हैं तो भाई चाचा जी अमेरिका जा रहे हैं। मेरे कजिन अमेरिका जा रहे हैं। फिर जब वहां दो-ती साल हो जाते हैं तो यहां वालों को शौक बहुत होता है विदेश जाने का। उनको यार देखो कुछ जुगाड़ हमें भी बुला लो वहां पर हो जाए। अब वो वहां पर जाकर बैठ गए हैं। वहां पर चाहे बर्तन मांझ रहे हो। वहां पर चाहे रेस्टोर में प्लेटें धो रहे हो। यहां आप देखने तो जा नहीं रहे ना। वो अमेरिका में है वहां पर। तो उनकी साख बन जाती है। फिर यहां पर वापस आने में इज्जत कम होती है। तो वहां के बारे में आप बुरा नहीं बता सकते। जहां आप रह रहे हैं वहां बुरा बताएंगे। वो कहेंगे अच्छा तब तो बड़ी डींगे मार के गए थे। अमेरिका जा रहा हूं। अब क्या हो गया? तो ये उनके सामने एक विडंबना है। बट इसीलिए मैंने सलाह दी कि अब आप वंटियरली डिसीजन लेंगे तो यू विल टेक अ वाइ। मुझे लग रहा है जो मैंने पहले आपके शो के भी कहा है। अगले 10 साल भारत के हैं। दिस इज द प्लेस टू बी। मैं यह नहीं कहता हमारे यहां गरीबी नहीं है, बेरोजगारी नहीं है। हमारे यहां कृषि समस्या नहीं है। अमीरी गरीबी का गैप नहीं है। ये सब मैं नहीं कहता कि ये सब ये सब चीजें जा चुकी है हमारे यहां से। बट मुझे लगता है कि अगर उनके पास धन है तो दिस इज द बेस्ट प्लेस टू बी। अगर आपके पास पैसा है तो आपको विदेश में सेटल नहीं हो। देखिए मैं अब व्यक्तिगत बात एक आपको एक बहुत जरूरी बात बोल रहे हैं आप। एक मतलब उसको एंजॉय करना हो तो यहां आओ। एक हां एक्सैक्टली मैं आपको व्यक्तिगत बात बता रहा हूं। अ ऊपर वाले की कृपा से अगर मेरे सामने आप एक ग्लोब रख दे जो घूमता है और मैं अपनी आंखें बंद कर लूं और हाथ में एक पेन ले लूं और मैं पेन लेके घूमते ग्लोब पर आंख बंद करके रख दूं जहां वो पेन पड़े मैं वहां जाके सेटल हो सकता था और मैंने सारी दुनिया मेरे इतना मोटा मेरा पासपोर्ट है। सारी दुनिया कई दफे घूमी। सब देशों में गया। वहां जाके काम भी किया, बिजनेस भी किया, वहां से डील भी किया। मेरा प्रोफेशन और बिजनेस इस प्रकार का था। ये सब मैं आपको वहां देखने के बाद बता रहा हूं। यह क्लास भी हैं। दिस इज द बेस्ट प्लेस टू बी। मत कोसिए अपने देश को। जो देश आपको ये दे सकता है वो अमेरिका नहीं दे सकता है।ये वो बता सकता है जिसने दोनों तरफ कॉइन के देखे हैं। वो भी देखा है। ये भी देखा है। ये वही बता सकता है। ये थ्योरिटिकल बात नहीं बता रहा। और फ्यूचरिस्टिक एप्रोच है। क्योंकि हम ऐसे जा रहे हैं। हम ऐसे नहीं जा रहे। जो वहां पे बैठे हुए हैं वो तो ऐसे ही आएंगे स्लाइड करके।

सवाल: अभी जो हलचल मची हुई है ऐसे वक्त हम लोग खुद को कैसे तैयार करे? चाहे वो निवेश, जॉब या जिंदगी जीने के लिहाज से हो इस पर आपकी राय क्या होगी?

जवाब: इन पांच एसेट्स में एक ही निवेश की क्लास में सारे पैसे मत रखिए। डोंट पुट ऑल एग्स इन द सेम बास्केट। एक ही टोकरी में सारे के सारे अपने रिसोर्सेज को नहीं रखना चाहिए। ऐसे में आपको स्प्रेड क्योंकि अगर कोई एक एसेट क्लास डूबती है तो बाकी की आपके लिए सपोर्ट का काम करती है। यह तो रही इन्वेस्टमेंट की स्ट्रेटजी। बाकी इन्वेस्टमेंट पे कभी फिर मौका लगा तो उसके लिए करना पड़ेगा। उसके लिए अलग से कभी चर्चा करेंगे। दूसरा आपने कहा कि जो नौकरी वाले हैं उनको क्या करना चाहिए? देखिए हमने क्या कर रखा है? एक मंदी का मैनुअल बनाया हुआ है। मैंने बनाया हुआ है। मंदी का मैनुअल अगर मंदी आती है तो आम आदमी को यही जानना था। क्या करना चाह क्या करना चाहिए? तो पहली बात तो आपको यह करनी चाहिए कि अपनी नौकरी के बारे में और यहां भी जितने भी इस रूम में जितने लोग हैं वो भी इसको नोट कर लें। जो कैमरे के पीछे खड़े हैं वो भी नोट कर लें और जो कैमरे को देख रहे हैं वो भी नोट कर लें। अपने नौकरी के बारे में पजेसिव हो जाइए। लोग क्या होता है कि रेजिग्नेशन लेटर ना जेब में रख के घूमते हैं। अरे यार मजा नहीं आ रहा नौकरी में। अरे यार बॉस ऐसा ही है। साला बदतमीजी करता है। मजा नहीं आ रहा यार काम करने में। यहां तो पॉलिटिक्स बहुत है। यहां यहां पर बहुत ये सब जब मंदी आती है तो नौकरी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। हो सकता है कि अगर आपने नौकरी रिजाइन कर दिया तो फिर शायद ऐसी नौकरी मिलने में दिक्कत आ सकती है। या आपको वो तनख्वाह ना मिले या यू माइट बी अ स्क्वायर पैग इन अ राउंड होल और अ स्क्वायर होल इन अ राउंड पैग। इसका मतलब होता है कि आपकी स्किल कुछ और है पर नौकरी कुछ और करनी पड़ रही है। एडजस्ट करना। तो एक तो आपको अभी आज दो ही चीज़ बताऊंगा मैं। आज सारी नहीं बताऊंगा। फिर अगली बार के लिए दूसरी चीज जो मैं बताना चाहूंगा कि अगर ऐसे में आपने कोई ऐसा निर्णय लिया हुआ है कि आप कोई बड़ा खर्च करना चाहते हैं। मकान लेना है, कार लेनी है, कोई बड़ा फंक्शन घर पे करना है, अगर उसको टाल सकते हैं तो टाल दीजिए। ज्यादा खर्चा हो रहा है। बहुत जरूरी है तो तो करना पड़ेगा। पर अगर टल सकता है तो ऐसे में लिक्विडिटी हाथ में रखनी चाहिए। मैंने ना जाने कितने इंटरेक्शंस किए उसमें लॉकडाउन में वही लोग कंफर्टेबली रह पाए जिनके हाथ में पैसा था। हम जो एक गांव में कहावत होती है आई चलाई। आई चलाई होता है जो आया खर्च हो गया। जो आया खर्च हो गया। बचा कुछ नहीं। जिन लोगों के पास लिक्विडिटी नहीं थी, सेविंग्स नहीं थी उन लोगों को बहुत कष्टदाई वो पीरियड साबित हुआ कोविड का। तो मुझे लग रहा है कि अगर आपका वो खर्चा टल सकता है। मान लीजिए 500 आदमियों की कोई आपने फंक्शन करना है घर में और सिर्फ इसलिए करना है समाज में। अरे भाई हमने भी बहुत बढ़िया फंक्शन किया। तो अगर वो टल सकता है 50 आदमियों में कर दीजिए। बड़ा खर्चा फिलहाल टाल दीजिए। जब तक ट्रंप साहब का दिमाग ठिकाने नहीं आता। जब तक कुछ ये जो अनसर्टेनिटी और अनिश्चितता सी पैदा हो गई है पूरीृ अर्थव्यवस्था में जब तक ये बादल छटता नहीं है जब तक ये डस्ट सेटल नहीं होती तब तक के लिए मैं नहीं कहता सदा के लिए टाल दिए क्या कहेगा यार हमारे घर में शादी थी कहते हैं 50 आदमियों को बुला के शादी कर दो हमने तो कार्ड भी छपवा लिए बांट भी दिए सब जगह और बट गए हैं तो बट गए हैं पर अगर बड़ा खर्चा टाल सकते हैं तो टाल दीजिए ऐसे में लिक्विडिटी को हाथ में रखना चाहिए।

Sunil Gupta

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