Middle East Military Alliance:
Middle East Military Alliance: दुनिया की भू-राजनीति एक बार फिर करवट लेती दिख रही है। मिडिल ईस्ट से लेकर दक्षिण एशिया तक एक ऐसा सैन्य गठबंधन आकार ले रहा है, जिसकी आहट ने वैश्विक ताकतों की नींद उड़ा दी है। चर्चा है कि तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब एक साझा सैन्य समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके हैं एक ऐसा समझौता जिसे कूटनीतिक हलकों में ‘मुस्लिम NATO’ कहा जा रहा है।
अगर यह गठबंधन अस्तित्व में आता है, तो ताकत का संतुलन बदल सकता है, युद्ध और शांति के समीकरण नए सिरे से लिखे जा सकते हैं और भारत की सुरक्षा रणनीति भी एक नई परीक्षा में पड़ सकती है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, तुर्की अब उस Strategic Mutual Defence Agreement (SMDA) में शामिल होने की अंतिम चरण की बातचीत कर रहा है, जो पहले से ही सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच लागू है। यह समझौता सितंबर 2025 में रियाद में साइन हुआ था, जिसमें सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने दस्तखत किए थे। अब अगर तुर्की इसमें शामिल होता है, तो यह सिर्फ एक डिफेंस डील नहीं बल्कि त्रिपक्षीय सैन्य ब्लॉक बन जाएगा जो अमेरिका-यूरोप के NATO जैसा मॉडल अपनाएगा।
इस समझौते की सबसे खतरनाक शर्त है Collective Defence Clause यानी अगर किसी एक सदस्य पर हमला होता है, तो बाकी दो देश उसे अपने ऊपर हमला मानेंगे और सैन्य जवाब देंगे। यह बिल्कुल NATO के आर्टिकल-5 जैसा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह क्लॉज़ मिडिल ईस्ट और साउथ एशिया की राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है। क्योंकि अब किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष में तीन देशों की संयुक्त ताकत मैदान में उतर सकती है।
इस संभावित गठबंधन में हर देश अपनी-अपनी सबसे बड़ी ताकत ला रहा है-
सऊदी अरब- अरब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, बेहिसाब पैसा, कूटनीतिक प्रभाव और ऊर्जा शक्ति
पाकिस्तान- परमाणु हथियार, मिसाइल तकनीक और बड़ी थल सेना
तुर्की- आधुनिक हथियार, युद्ध का अनुभव और NATO की दूसरी सबसे बड़ी सेना
यानी पैसा + परमाणु शक्ति + आधुनिक सेना = एक खतरनाक कॉम्बिनेशन।
सबसे बड़ा सवाल तुर्की की भूमिका को लेकर है। तुर्की पहले से NATO का सदस्य है, लेकिन अब वह मुस्लिम देशों की लीडरशिप की तरफ बढ़ रहा है। एक ओर अमेरिका से F-35 जेट प्रोग्राम में वापसी की कोशिश, दूसरी ओर पाकिस्तान-सऊदी के साथ नया सैन्य ब्लॉक — अंकारा दोनों ध्रुवों पर खेल रहा है। तुर्की के रणनीतिकारों का कहना है कि अमेरिका अब सिर्फ अपने और इज़राइल के हित देख रहा है, इसलिए तुर्की को नए सुरक्षा विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं।
तुर्की की बढ़ती भूमिका की गूंज वॉशिंगटन तक सुनाई दे रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्की को गाज़ा के भविष्य से जुड़े **‘Board of Peace’ में शामिल किया है। इससे साफ है कि तुर्की एक साथ कई फ्रंट पर अपनी ताकत बढ़ा रहा है।
भारत के लिए यह गठबंधन सीधा रणनीतिक खतरा बन सकता है। अगर भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच कोई तनाव बढ़ता है, तो SMDA के तहत तुर्की और सऊदी अरब पाकिस्तान के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। अब तक पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर इन देशों से सिर्फ राजनीतिक समर्थन लेता रहा है, लेकिन अगर यह समर्थन सैन्य रूप ले लेता है, तो भारत की सुरक्षा योजना को नए सिरे से तैयार करना पड़ेगा।
हालांकि, भारत के पास भी बड़ा कूटनीतिक हथियार है उसका विशाल बाजार, ऊर्जा साझेदारी और निवेश की ताकत। सऊदी अरब के लिए भारत को नाराज़ करना आसान फैसला नहीं होगा।
इतिहास गवाह है कि सऊदी अरब और तुर्की के बीच मुस्लिम दुनिया की लीडरशिप को लेकर गहरी प्रतिस्पर्धा रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह गठबंधन सिर्फ कागज़ों तक सीमित रहता है या ज़मीन पर भी मजबूत खड़ा होता है। लेकिन एक बात साफ है अगर यह तिकड़ी एक साथ आई, तो एशिया की राजनीति में एक नई धुरी (New Axis of Power) जन्म ले लेगी और भारत को अपने हर कदम पर पहले से ज्यादा सतर्क रहना होगा।
क्या यह गठबंधन बनेगा या टूटेगा? और क्या भारत की कूटनीति इसमें दरार डाल पाएगी? आने वाले महीने इसका जवाब देंगे।
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