Pune Municipal Election
Pune Municipal Election: महाराष्ट्र की राजनीति में नगर निगम चुनावों ने ऐसी सियासी तस्वीर पेश की है, जिसने पुराने समीकरणों को पूरी तरह पलट दिया है। खासतौर पर पुणे नगर निगम चुनाव में गठबंधन का एक ऐसा नया मॉडल सामने आया है, जिसने राज्य की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने के संकेत दे दिए हैं। जिन दलों ने 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ लड़े थे, वही अब अलग-अलग रास्तों पर चलते दिख रहे हैं, जबकि पुराने विरोधी नई सियासी दोस्ती निभाते नजर आ रहे हैं।
अब तक महाराष्ट्र की राजनीति दो बड़े गठबंधनों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, BJP के नेतृत्व वाली महायुति और शिवसेना (UBT) के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी। लेकिन पुणे नगर निगम चुनाव में तीसरे गठबंधन के उभरने से पूरा खेल बदल गया है। यहां BJP और एकनाथ शिंदे की शिवसेना एक साथ मैदान में हैं, जबकि अजित पवार ने इस जोड़ी से दूरी बनाकर अपने चाचा शरद पवार की एनसीपी (SP) के साथ हाथ मिला लिया है। उधर, कांग्रेस ने भी अलग रणनीति अपनाते हुए पुणे में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के साथ गठबंधन कर लिया है।
यह स्थिति इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में महायुति के तीनों दल BJP, शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की NCP एकजुट थे। वहीं महाविकास अघाड़ी में कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) और शरद पवार की NCP साथ थीं। लेकिन नगर निगम चुनाव आते-आते दोनों ही गठबंधन बिखरते नजर आ रहे हैं। 29 नगर निगमों में से 15 में BJP और शिंदे साथ हैं, जबकि 14 शहरों में वे आमने-सामने हैं। अजित पवार की NCP अधिकांश जगहों पर अकेले चुनाव लड़ रही है।
पुणे में यह सियासी प्रयोग सबसे ज्यादा चर्चा में है। यहां BJP और शिंदे की शिवसेना के बीच सीट बंटवारे को लेकर तनाव साफ दिख रहा है। 165 सीटों वाले पुणे नगर निगम में BJP ने शिंदे गुट को सीमित सीटें देने का प्रस्ताव रखा है, जबकि शिंदे गुट ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारना चाहता है। यह खींचतान गठबंधन के भीतर असहजता को उजागर करती है।
दूसरी ओर, पवार परिवार की सियासी नजदीकी ने सबको चौंका दिया है। अजित पवार और शरद पवार की पार्टियां पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में मिलकर चुनाव लड़ रही हैं। तय फॉर्मूले के तहत पुणे की 165 सीटों में से 130 पर अजित पवार की एनसीपी और 35 पर शरद पवार की NCP (SP) उम्मीदवार उतार रही है। यह गठबंधन एनसीपी के पुराने गढ़ में बड़ा असर डाल सकता है।
कांग्रेस की भूमिका भी कम अहम नहीं है। जहां मुंबई में कांग्रेस ने ठाकरे बंधुओं से दूरी बनाई है, वहीं पुणे में उसने उद्धव और राज ठाकरे के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। यह रणनीति बताती है कि कांग्रेस शहर-दर-शहर अलग राजनीतिक प्रयोग करने के मूड में है।
2017 के पुणे नगर निगम चुनावों में BJP ने 162 में से 97 सीटें जीतकर पहली बार मेयर बनाया था। यही वजह है कि पार्टी इस बार भी अपना दबदबा बनाए रखने की कोशिश में है। लेकिन बदले हुए गठबंधन समीकरण, पवार परिवार की एकजुटता और ठाकरे बंधुओं के साथ कांग्रेस की नई केमिस्ट्री ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है।
साफ है कि पुणे का यह सियासी प्रयोग सिर्फ एक नगर निगम चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा। इसके नतीजे ठाणे, नासिक, नागपुर और छत्रपति संभाजीनगर जैसे शहरों के साथ-साथ महाराष्ट्र की राज्य राजनीति पर भी गहरा असर डाल सकते हैं। अब सवाल सिर्फ इतना है, इस नए गठबंधन मॉडल से सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा और किसे सियासी नुकसान झेलना पड़ेगा? जवाब पुणे की जनता के वोट में छिपा है।
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