Thursday, Aug 27

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इथेनॉल की बढ़ी भूख ने महंगा किया अंडा! चीनी के बाद महंगाई की एक और मार

Egg Price Hike: देश में रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के बीच अंडे भी महंगे हो गए हैं। पिछले एक साल में अंडों के दाम करीब 35-40 फीसदी बढ़े हैं। नेशनल एग को-ऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) के मुताबिक पोल्ट्री फार्म से निकलने वाले एक अंडे की कीमत करीब 7 रुपये पहुंच गई है, जबकि कई खुदरा बाजारों में यह 8.50-9 रुपये तक बिक रहा है। इसकी प्रमुख वजहों में पोल्ट्री फीड की बढ़ती लागत शामिल है।

एथेनॉल के लिए मक्के की बढ़ती मांग

मुर्गियों के चारे में मक्का अहम कच्चा माल है। वहीं पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने की नीति के कारण एथेनॉल उत्पादन में अनाज, खासकर मक्के का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। ESY 2025-26 में एथेनॉल उत्पादन के लिए करीब 125.78 लाख टन मक्का इस्तेमाल होने का अनुमान है। हालिया आंकड़ों में मक्का एथेनॉल उत्पादन का सबसे बड़ा फीडस्टॉक बन चुका है।

आर्थिक सर्वे 2025-26 के अनुसार, एथेनॉल की बढ़ती मांग ने मक्के की कीमतों और किसानों के खेती संबंधी फैसलों को प्रभावित किया है। FY22 से FY25 के बीच मक्का आधारित एथेनॉल की प्रशासित कीमत में औसतन 11.7% सालाना वृद्धि हुई, जिससे किसानों के लिए मक्के की खेती आकर्षक हुई।

मक्का महंगा होने से फीड पर असर

पोल्ट्री उद्योग की सबसे बड़ी लागत में फीड शामिल है और इसमें मक्का महत्वपूर्ण हिस्सा रखता है। मक्का और सोयाबीन जैसे कच्चे माल की कीमत बढ़ने से चारे की लागत सीधे बढ़ती है। हालांकि, अंडों की कीमत बढ़ने की वजह सिर्फ एथेनॉल नहीं है। मौसम, मक्के का उत्पादन, पोल्ट्री फीड की मांग और अन्य फीड इनपुट की कीमतें भी इसमें भूमिका निभाती हैं।

भारत को करना पड़ा मक्का आयात

बढ़ती घरेलू मांग के चलते भारत ने 2024 में करीब 8.9 लाख टन मक्का आयात किया, जिसमें म्यांमार और यूक्रेन प्रमुख स्रोत रहे। 2024-25 में भी आयात बढ़ा। यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि भारत पहले मक्का निर्यात करता था। हालांकि, 2024-25 में देश का मक्का उत्पादन करीब 4.34 करोड़ टन रहा और सरकार उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दे रही है।

सर्दियों में और बढ़ सकते हैं दाम?

सर्दियों में अंडों की खपत आम तौर पर बढ़ जाती है। ऐसे में यदि मक्का और फीड की लागत ऊंची रहती है, तो मांग बढ़ने पर अंडों की कीमतों पर और दबाव आ सकता है। हालांकि, कीमतों का भविष्य मुर्गियों की उत्पादकता, मौसम, फीड की अन्य लागत और बाजार में सप्लाई पर भी निर्भर करेगा। यानी एथेनॉल के लिए बढ़ती मक्के की मांग ने पोल्ट्री उद्योग के सामने लागत की नई चुनौती जरूर खड़ी कर दी है।

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