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भारत के पहले शिक्षा मंत्री कभी स्कूल नहीं गए, फिर भी IIT और UGC की रखी नींव

Maulana Abul Kalam Azad: "मेरे पिता पुराने तौर-तरीकों में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। उन्हें पश्चिमी शिक्षा पर भरोसा नहीं था।" मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी आत्मकथा India Wins Freedom में लिखा था। उनके पिता मौलाना खैरुद्दीन ने उन्हें मदरसे तक नहीं भेजा और घर पर ही पढ़ाया। लेकिन यही बच्चा आगे चलकर स्वतंत्र भारत का पहला शिक्षा मंत्री बना और करीब 11 वर्षों तक देश की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की नींव तैयार करने में जुटा रहा।

1888 में मक्का में जन्मे आजाद ने 10 साल की उम्र से पहले ही फारसी शब्दकोश तैयार करना शुरू कर दिया था। इतिहासकार एस. इरफान हबीब के अनुसार, उन्होंने 12 साल की उम्र तक अपनी शुरुआती शिक्षा पूरी कर ली थी। किशोरावस्था में वे कविता लिखने और पत्रिका निकालने लगे। 15 साल की उम्र में उन्होंने मासिक पत्रिका लिसान-उस-सिद्क का संपादन किया। बाद में अल-हिलाल और अल-बलाग के जरिए ब्रिटिश शासन के खिलाफ पत्रकारिता को हथियार बनाया।

35 वर्ष की उम्र में वे कांग्रेस के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने। उन्होंने भारत के विभाजन का कड़ा विरोध किया और विभाजन के बाद दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों से डरे हुए मुसलमानों से भारत न छोड़ने की अपील की।

घर की पढ़ाई से बने असाधारण स्वाध्यायी

आजाद का परिवार इस्लामी विद्वानों का था। उनके पिता पश्चिमी शिक्षा को धार्मिक आस्था के लिए खतरा मानते थे। कलकत्ता में बसने के बाद आजाद को घर पर फारसी, अरबी, धर्मशास्त्र, दर्शन, ज्यामिति, गणित और बीजगणित पढ़ाया गया। उनके पिता ने खुद उन्हें पढ़ाया और बाद में अलग-अलग विषयों के लिए विद्वान शिक्षक नियुक्त किए।

आजाद औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं थे, लेकिन उनका अध्ययन बेहद व्यापक था। उन्होंने 16 वर्ष की उम्र तक पारंपरिक शिक्षा का पूरा पाठ्यक्रम पूरा कर लिया था और बाद में करीब 15 विद्यार्थियों को दर्शन, गणित और तर्कशास्त्र पढ़ाने लगे।

सर सैयद अहमद खान की रचनाओं से प्रभावित होकर उन्होंने समझा कि आधुनिक शिक्षा में विज्ञान, आधुनिक दर्शन और साहित्य भी जरूरी हैं। उन्होंने गुप्त रूप से अंग्रेजी सीखनी शुरू की, शब्दकोश की मदद से अखबार पढ़े और इतिहास व दर्शन की किताबों का अध्ययन किया। उनके लिए शिक्षा केवल ज्ञान हासिल करना नहीं, बल्कि स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाने का माध्यम थी।

किशोर संपादक से स्वतंत्रता सेनानी तक

15 साल की उम्र में लिसान-उस-सिद्क शुरू करने वाले आजाद की प्रतिभा ने लोगों को चौंका दिया। 1912 में उन्होंने अल-हिलाल निकाला, जिसमें ब्रिटिश शासन की आलोचना और हिंदू-मुस्लिम एकता का समर्थन किया गया। ब्रिटिश सरकार ने इसे राजद्रोही मानकर जुर्माने और सुरक्षा राशि जैसी कार्रवाइयां कीं। इसके बाद आजाद ने 1915 में अल-बलाग शुरू किया, लेकिन 1916 में उन्हें रांची के पास एक छोटे आदिवासी गांव मोरहाबादी में निर्वासित कर दिया गया।

कांग्रेस और महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने के बाद उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। 1923 में 35 वर्ष की उम्र में उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन की अध्यक्षता की और पार्टी के भीतर मतभेदों के बीच समझौते का रास्ता निकालने में भूमिका निभाई।

विभाजन के विरोध से देश के पुनर्निर्माण तक

1930 के दशक में जब कई मुस्लिम नेता अलग इस्लामी राष्ट्र की मांग कर रहे थे, आजाद ने दो-राष्ट्र सिद्धांत का विरोध किया। उनका मानना था कि हिंदू और मुसलमान अलग राष्ट्र नहीं हैं और साझा इतिहास, भूगोल, भाषा, आर्थिक जीवन और राजनीतिक भविष्य उन्हें एक राष्ट्र बनाते हैं। उन्होंने मदीना के समझौते का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग धर्मों के लोग एक साझा राजनीतिक समुदाय बना सकते हैं।

1940 से 1946 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग का विरोध किया और कैबिनेट मिशन योजना के जरिए भारत की एकता बचाने की कोशिश की। योजना विफल होने और माउंटबेटन योजना के तहत विभाजन स्वीकार होने पर उन्होंने लिखा कि उनके "सबसे बुरे डर सच साबित हुए।"

अगस्त 1947 में आजादी के साथ विभाजन, हिंसा और विस्थापन ने उन्हें गहरा दुख पहुंचाया। कुछ सप्ताह बाद जामा मस्जिद से अपने ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने दिल्ली के मुसलमानों से डर छोड़कर भारत में रहने और अपनी साझा विरासत को स्वीकार करने की अपील की।

IIT से तकनीकी शिक्षा तक

आजाद ने अगस्त 1947 से फरवरी 1958 में अपनी मृत्यु तक शिक्षा मंत्री के रूप में काम किया। उस समय भारत गरीब, बड़े पैमाने पर अशिक्षित और विभाजन से प्रभावित था। स्कूलों और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी थी। आजाद समझते थे कि राजनीतिक आजादी तभी सार्थक होगी जब देश के पास इंजीनियर, वैज्ञानिक, डॉक्टर, शोधकर्ता और प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी हों।

इसी सोच के तहत खड़गपुर में देश के पहले IIT की नींव पड़ी। कभी ब्रिटिश शासन में राजनीतिक कैदियों के लिए इस्तेमाल किए गए हिजली परिसर में शुरू हुए इस संस्थान को बाद में अगस्त 1951 में IIT खड़गपुर के रूप में औपचारिक रूप से स्थापित किया गया। इसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय, जवाहरलाल नेहरू, वैज्ञानिकों, समितियों और प्रशासन की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। आजाद ने तकनीकी शिक्षा के विस्तार, AICTE के पुनर्गठन और वैज्ञानिक मानव संसाधन की योजना पर भी जोर दिया।

UGC और सभी के लिए शिक्षा का सपना

आजाद उच्च शिक्षा को केवल अभिजात वर्ग तक सीमित नहीं रखना चाहते थे। उनका मानना था कि बुनियादी शिक्षा हर व्यक्ति का अधिकार है। उन्होंने मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा, वयस्क साक्षरता, शिक्षक प्रशिक्षण, महिला शिक्षा और शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाने की वकालत की। उनके कार्यकाल में केंद्रीय शिक्षा बजट करीब 2 करोड़ रुपये से बढ़कर 30 करोड़ रुपये से अधिक हुआ।

1948 में उन्होंने डॉ. एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग बनाया। इसकी सिफारिशों ने 1953 में UGC के गठन और 1956 में इसे वैधानिक दर्जा मिलने का रास्ता तैयार किया। उन्होंने तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा के साथ सांस्कृतिक विकास को भी समान महत्व दिया। उनके कार्यकाल में साहित्य, कला और संगीत के लिए साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी तथा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) जैसे संस्थानों को आकार मिला।

आजाद की विरासत का असली अर्थ

मौलाना अबुल कलाम आजाद की कहानी केवल इस बात की नहीं है कि उन्होंने स्कूल या कॉलेज में पढ़ाई नहीं की। उन्होंने कभी औपचारिक शिक्षा संस्थानों को महत्वहीन नहीं माना और न ही डिग्री या छात्रवृत्ति को खारिज किया। इसके उलट, उन्होंने ऐसे संस्थान बनाने में जीवन लगा दिया, जिनमें वे खुद कभी विद्यार्थी नहीं रहे थे।

आजाद का मानना था कि एक देश केवल असाधारण स्वाध्यायी लोगों के भरोसे आगे नहीं बढ़ सकता। जिस व्यक्ति ने कभी स्कूल की बेंच पर बैठकर पढ़ाई नहीं की, उसने करीब 11 वर्षों तक ऐसा शिक्षा तंत्र खड़ा करने की कोशिश की, जो पूरे गणराज्य के करोड़ों लोगों के लिए एक विशाल कक्षा बन सके।

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Tanisha Verma

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