Menopause Awareness: भारत में मेनोपॉज को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ गलत जानकारी भी तेजी से फैल रही है। नई दिल्ली में हुए India Today Woman Summit 2026 में Fortis La Femme की एसोसिएट डायरेक्टर (ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी) डॉ. अनीता गुप्ता और Max Healthcare के ग्रुप चेयरमैन व हेड (एंडोक्रिनोलॉजी एंड डायबिटीज) डॉ. अम्बरीश मिथल ने इससे जुड़े कई अहम पहलुओं पर बात की।
मेनोपॉज की उम्र क्यों बदलती है?
‘Menopause Matters: The Silent Health Crisis’ सत्र में डॉ. गुप्ता ने कहा कि मेनोपॉज बदला नहीं है, बल्कि अब महिलाएं इसके बारे में ज्यादा जागरूक हुई हैं। शहरी तनाव, खराब खान-पान और कम शारीरिक गतिविधि लक्षणों को बढ़ा सकते हैं, लेकिन मेनोपॉज की उम्र मुख्यतः आनुवंशिक होती है। भारत में इसकी औसत उम्र 47 साल है, हालांकि उत्तर-पश्चिम से पूर्वोत्तर तक क्षेत्रीय अंतर देखा जाता है।
हड्डियों से दिल तक असर
डॉ. मिथल ने बताया कि मेनोपॉज के बाद सिर्फ हॉट फ्लैश नहीं, बल्कि पेट की चर्बी, इंसुलिन रेजिस्टेंस, डायबिटीज और हृदय रोग का खतरा बढ़ता है। एस्ट्रोजन का सुरक्षात्मक प्रभाव खत्म होने के बाद इसका असर ज्यादा दिख सकता है। मेनोपॉज के आसपास पांच साल में महिलाएं करीब 10% बोन मास खो सकती हैं।
HRT पर क्या बोले विशेषज्ञ?
डॉ. मिथल ने कहा कि 2001 की Women’s Health Initiative स्टडी के बाद HRT को लेकर बनी कई आशंकाओं को नई रिसर्च और ट्रांसडर्मल विकल्पों ने बदला है। हालांकि, HRT हर महिला के लिए जोखिम-मुक्त नहीं है। उम्र, मेनोपॉज के बाद उपचार शुरू करने का समय और ब्रेस्ट कैंसर या ब्लड क्लॉटिंग जैसी व्यक्तिगत स्थितियां महत्वपूर्ण हैं।
45 की उम्र से जांच जरूरी
डॉ. गुप्ता ने बताया कि अब ज्यादा महिलाएं लक्षण गंभीर होने से पहले डॉक्टरों से सलाह ले रही हैं और ऑनलाइन अपुष्ट जानकारी से बचने की जरूरत है। दोनों विशेषज्ञों ने 45 साल की उम्र से सालाना हेल्थ चेकअप, बोन डेंसिटी, हृदय जोखिम और कैंसर स्क्रीनिंग की सलाह दी। साथ ही वजाइनल हेल्थ और सेक्सुअल वेलबीइंग पर भी खुलकर बात करने की जरूरत बताई।

