Kathmandu: नेपाल ने विनाशकारी बाढ़ के बाद दुनिया के सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों चीन, अमेरिका और भारत से जलवायु मुआवजे की मांग उठाई है। नेपाल का कहना है कि कम उत्सर्जन के बावजूद वह जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव झेल रहा है। इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में उठाने के लिए प्रधानमंत्री बालेन्द्र ‘बालेन’ शाह के न्यूयॉर्क जाने की संभावना है।
26 अगस्त को भोटेकोशी नदी बेसिन में आई विनाशकारी बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में भारी तबाही मचाई। नेपाल पुलिस के मुताबिक 1 सितंबर तक कम से कम 1,127 लोगों की मौत हो चुकी थी और करीब 3,900 लोग लापता हैं। माना जा रहा है कि नेपाल-चीन सीमा के पास बड़े चट्टान और बर्फीले हिमस्खलन से यह आपदा शुरू हुई। घरों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा है और हजारों लोग विस्थापित हैं। नेपाल इसे ‘हिमालयन सुनामी’ बता रहा है। नेपाल को पुनर्निर्माण के लिए करीब 4-5 अरब डॉलर की जरूरत पड़ सकती है, जो उसकी अर्थव्यवस्था का लगभग 10% है।
विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि चीन, अमेरिका और भारत जैसे बड़े उत्सर्जक देशों की कमजोर देशों के प्रति जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा, “यह चैरिटी नहीं, कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी का मामला है।” नेपाल ने अपनी कूटनीतिक नीति को सहायता से हटाकर ‘न्याय और मुआवजे’ की ओर ले जाने की बात कही है। हालांकि, 2024 के EDGAR आंकड़ों में चीन, अमेरिका और भारत कुल उत्सर्जन में शीर्ष तीन देशों में हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में भारत करीब 3 टन CO2-equivalent है, जबकि चीन लगभग 11 और अमेरिका 17 टन से ज्यादा है। भारत लंबे समय से जलवायु जिम्मेदारी तय करते समय ऐतिहासिक और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन, विकास की जरूरतों और पहले औद्योगिकीकरण करने वाले देशों की जिम्मेदारी को ध्यान में रखने की वकालत करता रहा है।
UNGA का 81वां सत्र 8 सितंबर से शुरू होगा और आम बहस सितंबर के तीसरे-चौथे सप्ताह में होगी। पहले खनाल के नेपाल का प्रतिनिधित्व करने की योजना थी, लेकिन The Kathmandu Post के मुताबिक बालेन शाह के जाने का प्रस्ताव विचाराधीन है। नेपाल ने UN-backed Fund for Responding to Loss and Damage से तत्काल आर्थिक सहायता भी मांगी है। यह फंड COP27 में 2022 में मंजूर और COP28 में सक्रिय किया गया था। नेपाल के अनुरोध पर वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले और वन एवं कृषि मंत्री गीता चौधरी ने हस्ताक्षर किए हैं। नेपाल ने राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण के साथ सुरंग-रेस्क्यू टीम, फोरेंसिक विशेषज्ञ और बेली ब्रिज जैसी विशेषज्ञ सहायता भी मांगी है।
नेपाल का कहना है कि बदलते पर्वतीय हालात ने आपदा को बढ़ाया, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से इस खास बाढ़ का सीधा संबंध स्थापित करने के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी है। शुरुआती आकलनों में चट्टान-बर्फ हिमस्खलन, अस्थिर ग्लेशियर और हिमालयी पारिस्थितिकी में बदलाव संभावित कारण माने जा रहे हैं। नेपाल ने पहले विदेशी राहत एवं बचाव सहायता ठुकराई थी, लेकिन बाद में भारत, चीन और अन्य देशों से विशेषज्ञ टीम और उपकरण मांगे। खनाल ने चेताया कि हिमालयी ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियां दक्षिण एशिया के अरबों लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं। नेपाल का तर्क है कि जिन देशों का वैश्विक गर्मी में योगदान कम है, उन्हें बार-बार अपनी ही तबाही का खर्च नहीं उठाना चाहिए।
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