Om Birla no confidence motion: लोकसभा में अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव बुधवार को ध्वनि मत से खारिज कर दिया गया। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने कई विपक्षी दलों के समर्थन के साथ पेश किया था। हालांकि, बहस के बाद सदन ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बहस के दौरान विपक्ष पर तीखा हमला करते हुए इस प्रस्ताव को लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा के खिलाफ बताया।
सदन में बोलते हुए अमित शाह ने कहा कि संविधान ने लोकसभा अध्यक्ष को मध्यस्थ की भूमिका दी है और इस पद की निष्पक्षता पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है। उन्होंने कहा कि पिछले 75 वर्षों में संसद के दोनों सदनों ने देश के लोकतंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शाह ने कहा, “संविधान ने अध्यक्ष को मध्यस्थ की भूमिका सौंपी है। यदि मध्यस्थ पर ही संदेह जताया जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव को कमजोर करने जैसा है।” उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष इस कदम के जरिए लोकतंत्र की मजबूत नींव पर सवाल खड़े कर रहा है।
गृह मंत्री ने लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका का बचाव करते हुए कहा कि सदन का संचालन आपसी विश्वास और नियमों के पालन पर आधारित होता है। उनके अनुसार, अध्यक्ष का काम निष्पक्ष संरक्षक के रूप में कार्य करना है, जो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के हितों की रक्षा करता है। शाह ने कहा कि लोकसभा की कार्यवाही वर्षों से स्थापित संसदीय परंपराओं और विश्वास के आधार पर चलती आई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अध्यक्ष किसी एक दल का प्रतिनिधित्व नहीं करते बल्कि पूरे सदन के संरक्षक होते हैं।
बहस के दौरान अमित शाह ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि विपक्ष अक्सर यह आरोप लगाता है कि उन्हें सदन में बोलने का मौका नहीं दिया जाता, लेकिन जब अवसर मिलता है तब कई बार वे मौजूद नहीं होते।
शाह ने यह भी दावा किया कि राहुल गांधी की संसद में उपस्थिति अपेक्षाकृत कम रही है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 16वीं लोकसभा के दौरान गांधी की उपस्थिति लगभग 52 प्रतिशत थी, जबकि उस समय सदन की औसत उपस्थिति करीब 80 प्रतिशत थी। इसी तरह 17वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति करीब 51 प्रतिशत रही, जबकि औसत उपस्थिति 66 प्रतिशत थी।
गृह मंत्री ने कहा कि विपक्ष को संसद में मुद्दे उठाने और बहस करने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसके लिए सदन में सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि जब सांसदों को बोलने का अवसर दिया जाए तो उन्हें उपस्थित रहकर चर्चा में भाग लेना चाहिए। शाह ने यह भी आरोप लगाया कि कई बार विपक्षी नेता ऐसे समय विदेश यात्राओं पर होते हैं, जब महत्वपूर्ण संसदीय बहसें चल रही होती हैं।
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