Pakistan News
Pakistan News: पाकिस्तान की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में है। दो दिनों में जो घटनाएं हुईं, उन्होंने यह साफ कर दिया कि देश में लोकतंत्र नहीं, बल्कि सेना की पकड़ और मजबूत होती जा रही है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ जितना भी लोकतांत्रिक चेहरा दिखाने की कोशिश करें, हकीकत यही है कि असली ताकत अब उनके हाथों में नहीं, बल्कि जनरल आसिम मुनीर के पास है।
दरअसल, पाकिस्तान की संसद में हाल ही में एक 27वां संवैधानिक संशोधन बिल पेश किया गया, जिसने पूरे देश में हलचल मचा दी है। इस संशोधन के तहत सेना प्रमुख को अब “चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज” का दर्जा देने का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही, ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी को खत्म कर दिया जाएगा और “नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड” नाम से एक नई इकाई बनाई जाएगी। इसके प्रमुख की नियुक्ति प्रधानमंत्री करेंगे, लेकिन सिफारिश आर्मी चीफ की होगी। इतना ही नहीं, फाइव-स्टार रैंक वाले अफसरों को आजीवन संवैधानिक सुरक्षा देने का भी प्रावधान जोड़ा गया है। यानि साफ है, अब पाकिस्तान में सेना न सिर्फ ताकतवर बल्कि संविधान से भी ऊपर होने जा रही है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह पूरा खेल जनरल आसिम मुनीर की रणनीति का हिस्सा है। अब वे सिर्फ सेना प्रमुख नहीं, बल्कि तीनों सेनाओं- थल, नौसेना और वायुसेना के सर्वोच्च कमांडर बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम “सेना को कानूनी अमरता” देने जैसा है, जिससे आने वाले वक्त में कोई भी सरकार उनके आदेशों से ऊपर नहीं जा सकेगी। इसी बीच, शहबाज शरीफ खुद विवादों में फंस गए जब उनके कुछ सीनेटरों ने प्रधानमंत्री को कानूनी कार्रवाई से छूट (इम्युनिटी) देने का संशोधन प्रस्तावित किया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि शरीफ खुद को भ्रष्टाचार मामलों से बचाने की कोशिश कर रहे हैं। मामला गर्माया तो शहबाज ने सफाई दी कि यह प्रस्ताव उनकी मंजूरी के बिना लाया गया था और तुरंत इसे वापस लेने के आदेश दे दिए।
लेकिन असली सवाल यही है, क्या शहबाज शरीफ अब सिर्फ “नाम के प्रधानमंत्री” रह गए हैं? क्योंकि हर बड़ा फैसला अब भी रावलपिंडी के आर्मी मुख्यालय से ही निकलता है। विपक्ष ने चेतावनी दी है कि अगर यह संशोधन पास हो गया, तो पाकिस्तान का लोकतंत्र इतिहास बन जाएगा और देश पूरी तरह एक संवैधानिक सैन्य शासन की गिरफ्त में आ जाएगा। यानी साफ है इस समय पाकिस्तान में असली सरकार इस्लामाबाद में नहीं, बल्कि जनरल मुनीर के हाथों में है। और अगर हालात ऐसे ही रहे, तो आने वाले दिनों में “पाकिस्तान” नहीं, “जनरलिस्तान” बनने से कोई नहीं रोक सकता।
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