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वंदे मातरम पर संसद में गरजे PM मोदी, बोले- जिन्ना का डर था या नेहरू की राजनीति? पढ़ें पीएम की बड़ी बातें

PM Modi in Parliament on Vande Mataram : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को लोकसभा में वंदे मातरम पर चर्चा की शुरुआत करते हुए विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम को लेकर मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई वाली मुस्लिम लीग के विरोध और उस समय कांग्रेस अध्यक्ष रहे जवाहरलाल नेहरू की भूमिका पर गंभीर सवाल उठते हैं।

पीएम मोदी ने पूछा, “1905 में वंदे मातरम महात्मा गांधी को राष्ट्रगान जैसा महत्वपूर्ण नजर आता था, तो पिछली सदी में इसके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हुआ? वंदे मातरम के साथ विश्वासघात क्यों किया गया? वह कौन-सी ताकत थी जिसकी इच्छा, पूज्य बापू की भावनाओं से भी बड़ी हो गई? जिसने वंदे मातरम जैसी पवित्र भावना को विवादों में घसीट दिया?”

प्रधानमंत्री के इन सवालों पर सदन में हलचल रही और विपक्ष की सीटों पर खामोशी देखने को मिली।

प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि महात्मा गांधी ने 2 दिसंबर 1905 को वंदे मातरम के बारे में लिखा था कि बंकिमचंद्र द्वारा लिखा यह गीत पूरे बंगाल में बेहद लोकप्रिय हो चुका था। स्वदेशी आंदोलन के दौरान लाखों लोग एक साथ इकट्ठा होकर वंदे मातरम गाते थे। गांधीजी ने लिखा था कि यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया था, जैसे यह हमारा राष्ट्रगान हो। इसकी भावनाएं बहुत महान हैं और यह कई देशों के गीतों से ज्यादा मधुर है। इसका उद्देश्य लोगों में देशभक्ति जगाना है। यह भारत को मां की तरह मानकर उसकी स्तुति करता है।

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “1905 में वंदे मातरम महात्मा गांधी को राष्ट्रगान जैसा लगा था, तो फिर बाद में इसके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हुआ? वंदे मातरम के साथ विश्वासघात क्यों किया गया? आखिर वो कौन-सी ताकत थी जिसकी वजह से बापू की भावनाओं को भी दरकिनार कर दिया गया? और किसने इस पवित्र गीत को विवादों में घसीटा?”

पढ़ें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन की बड़ी बातें

ईंट का जवाब पत्थर से

“1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज सल्तनत बौखलाई हुई थी। उस समय उनका राष्ट्रगीत था- गॉड सेव द क्वीन। इसे भारत में घर-घर पहुंचाने का षड्यंत्र चल रहा था। ऐसे में बंकिम दा ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया और वंदे मातरम का जन्म हुआ। वेदों में भी कहा गया है, "माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्याः"। यानी पृथ्वी मेरी माता है और मैं इस माता का पुत्र हूं।“

दुनिया में ऐसा कोई गीत नहीं

“बंकिम दा ने जब वंदे मातरम की रचना की, तो स्वाभाविक ही वह स्वतंत्रता आंदोलन का स्वर बन गया। हमें गर्व करना चाहिए कि दुनिया के इतिहास में कहीं पर भी वंदे मातरम जैसा कोई भावगीत नहीं रहा, जो सदियों तक एक लक्ष्य के लिए कोटि-कोटि जनों को प्रेरित करता रहा हो और जिसे सुनकर लोग जीवन आहूत करने के लिए निकल पड़ते हों।“

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी...

6 अंग्रेजों के उस दौर में भारत को कमजोर, निकम्मा, आलसी बताना एक फैशन बन गया था। हमारे यहां भी कुछ लोग वही भाषा बोलने लगे थे। तब बंकिम दा ने झकझोरने के लिए और सामर्थ्य का परिचय कराने के लिए वंदे मातरम के जरिए लिखा था- त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी...।

विश्वासघात क्यों हुआ?

1905 में जो वंदे मातरम महात्मा गांधी को राष्ट्रगान के रूप में दिखता था, उसके साथ पिछली सदी में इतना बड़ा अन्याय और विश्वासघात क्यों हुआ? वो कौन-सी ताकत थी, जिसकी इच्छा खुद पूज्य बापू की भावनाओं पर भी भारी पड़ गई और जिसने वंदे मातरम जैसी पवित्र भावना को भी विवादों में घसीट दिया ?

नेहरू को सिंहासन डोलता दिखा

6 मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ में 15 अक्तूबर 1937 को वंदे मातरम नारे का विरोध किया था, फिर कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा। नेहरू जी ने मुस्लिम लीग के बयानों का करारा जवाब नहीं दिया, न ही उनकी निंदा की, बल्कि इसके ठीक उलट किया।

नेहरू की नेताजी को चिट्ठी

6 जिन्ना के विरोध के पांच दिन बाद ही नेहरू जी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को चिट्ठी लिखी और जिन्ना की भावना से सहमति जताते हुए लिखा कि वंदे मातरम की आनंदमठ वाली पृष्ठभूमि मुस्लिमों को चिढ़ा सकती है और उन्हें लगता है कि इससे मुस्लिम भड़केंगे।

Kajal Sharma

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