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गंगा-यमुना में सिक्के डालना पुण्य है या प्रदूषण? प्रेमानंद महाराज ने बताया सही दृष्टिकोण

Premanand Maharaj: हाल के एक सत्संग में भक्तों ने वृंदावन के संत Premanand Maharaj से प्रश्न किया कि गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों में सिक्के डालना सही है या गलत। इस पर उन्होंने विस्तार से अपनी बात रखते हुए श्रद्धा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की सीख दी।

सिक्के डालने की परंपरा का क्या है अर्थ?

प्रेमानंद महाराज ने बताया कि प्राचीन समय में लोग नदियों में तांबे के सिक्के डालते थे। माना जाता था कि इससे जल की गुणवत्ता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। समय के साथ यह एक धार्मिक परंपरा बन गई और लोगों ने इसे श्रद्धा के प्रतीक के रूप में अपनाना शुरू कर दिया।

क्या आज भी नदियों में सिक्के डालने चाहिए?

महाराज के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति केवल श्रद्धा के भाव से सिक्का डालता है तो उसके पीछे की भावना महत्वपूर्ण है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि गंगा और यमुना को माता मानने वाले लोगों का कर्तव्य है कि वे नदियों को स्वच्छ रखें। यदि किसी कार्य से नदी में गंदगी या प्रदूषण बढ़ता है, तो उस पर पुनर्विचार करना चाहिए।

श्रद्धा से अधिक जरूरी है सेवा

उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति केवल प्रतीकात्मक कार्यों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। नदियों की सफाई, उनके संरक्षण और स्वच्छता के लिए योगदान देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। केवल धार्मिक मान्यता के नाम पर ऐसी चीजें नदी में नहीं डालनी चाहिए जो उसके प्राकृतिक स्वरूप को नुकसान पहुंचाएं।

क्या है संदेश?

प्रेमानंद महाराज का संदेश है कि श्रद्धा का सम्मान करते हुए पर्यावरण का भी ध्यान रखा जाए। गंगा और यमुना में सिक्के डालने से अधिक पुण्य नदियों को स्वच्छ रखने और उनकी रक्षा करने में है। यही सच्ची सेवा और धर्म का पालन माना जाना चाहिए।

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