वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर के दबदबे को चुनौती देने की कोशिशें लगातार तेज हो रही हैं। इसी कड़ी में रूस की ओर से विदेशी व्यापार में क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने का कदम चर्चा में है। रूस लंबे समय से पश्चिमी प्रतिबंधों और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था पर अपनी निर्भरता कम करने के विकल्प तलाश रहा है।
डॉलर को क्यों माना जाता है अमेरिका की ताकत
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की बड़ी भूमिका है। तेल, गैस और कई अन्य प्रमुख वस्तुओं के वैश्विक कारोबार में डॉलर का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था भी काफी हद तक डॉलर आधारित है। यही स्थिति अमेरिका को आर्थिक प्रतिबंध लगाने की मजबूत क्षमता देती है। किसी देश पर प्रतिबंध लगने के बाद उसके लिए अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और डॉलर आधारित भुगतान करना मुश्किल हो सकता है।
रूस के लिए क्रिप्टो क्यों महत्वपूर्ण
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। ऐसे में मॉस्को लगातार ऐसे विकल्प तलाश रहा है, जिनसे पश्चिमी बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भरता कम की जा सके। क्रिप्टोकरेंसी इस दिशा में एक वैकल्पिक रास्ता हो सकती है। डिजिटल परिसंपत्तियों के जरिए होने वाले कुछ लेन-देन में पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था की जरूरत कम हो सकती है। इससे रूस को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नए भुगतान विकल्प मिल सकते हैं।
क्या अमेरिका की बढ़ेगी चिंता
अगर आने वाले वर्षों में ज्यादा देश डॉलर के अलावा स्थानीय मुद्राओं, डिजिटल करेंसी या क्रिप्टो आधारित भुगतान व्यवस्था को अपनाते हैं, तो डॉलर की वैश्विक हिस्सेदारी पर असर पड़ सकता है। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि क्रिप्टो की वजह से अमेरिका का आर्थिक प्रभाव खत्म हो जाएगा। वैश्विक व्यापार में डॉलर की भूमिका अभी भी बेहद मजबूत है और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में बदलाव रातोंरात संभव नहीं है।
भारत के लिए क्या हो सकता है फायदा
भारत भी कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। रूस के साथ रुपये और रूबल में कारोबार के विकल्प पर पहले से चर्चा होती रही है। भविष्य में अगर वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था मजबूत होती है तो भारत को भी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए अतिरिक्त विकल्प मिल सकते हैं। इससे कुछ अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में लागत और भुगतान से जुड़ी चुनौतियां कम हो सकती हैं।
भारत क्रिप्टो को लेकर क्यों सतर्क है
भारत में निजी क्रिप्टोकरेंसी को आधिकारिक मुद्रा का दर्जा नहीं मिला है। सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक डिजिटल वित्तीय व्यवस्था को लेकर लगातार अपनी नीतियां विकसित कर रहे हैं। भारत की अपनी डिजिटल करेंसी यानी ई-रुपये पर भी काम चल रहा है। ऐसे में भारत के लिए निजी क्रिप्टो की तुलना में नियंत्रित डिजिटल भुगतान व्यवस्था ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।
दुनिया में बदल रही वित्तीय तस्वीर
रूस के कदम को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में हो रहे बड़े बदलाव के संदर्भ में देखा जा रहा है। चीन समेत कई देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिक्स देशों के बीच भी वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को लेकर चर्चा होती रही है। क्रिप्टो, डिजिटल करेंसी और स्थानीय मुद्राएं भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नए विकल्प बन सकती हैं। हालांकि, इनके सामने कीमतों में उतार-चढ़ाव, नियमों की कमी और भरोसे जैसी कई चुनौतियां भी हैं।
रूस का क्रिप्टो से जुड़ा कदम डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था के विकल्प तलाशने की उसकी कोशिश का हिस्सा माना जा सकता है। इससे अमेरिका की आर्थिक पकड़ को तत्काल कोई बड़ा झटका लगेगा, ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन अगर कई देश मिलकर वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को मजबूत करते हैं, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलाव जरूर देखने को मिल सकता है।
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