Sonam Wangchuk Hunger Strike: लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 26 दिनों तक चले अपने अनशन को समाप्त करने के बाद एक नया वीडियो संदेश जारी किया है। वीडियो के साथ उन्होंने लिखा, "भूख हड़ताल खत्म… जवाबदेही की शुरुआत!" अपने संदेश में उन्होंने कहा कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ नहीं था, बल्कि देश की परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित कराने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।
सरकार और सांसदों से मिला भरोसा
वीडियो संदेश में सोनम वांगचुक ने बताया कि उन्हें केंद्र सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों की ओर से यह भरोसा दिया गया है कि देश की परीक्षा प्रणाली में सामने आ रही अनियमितताओं और जवाबदेही के मुद्दे पर संसद में चर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा कि लिखित आश्वासन मिलने के बाद ही उन्होंने अपना अनशन समाप्त करने का फैसला लिया। उनके अनुसार, परीक्षा प्रक्रिया में सुधार और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए गंभीर पहल की आवश्यकता है। उनका मानना है कि संसद में इस विषय पर व्यापक चर्चा होने से समाधान की दिशा में सकारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं।
पीड़ित परिवारों को राहत का भरोसा
सोनम वांगचुक ने अपने संदेश में यह भी कहा कि उन्हें आश्वासन दिया गया है कि NEET पेपर लीक प्रकरण से प्रभावित परिवारों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाया जाएगा। इसके अलावा शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने वाले छात्रों और युवाओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं किए जाने का भी भरोसा दिया गया है। उन्होंने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य छात्रों की आवाज को लोकतांत्रिक तरीके से सामने लाना था और अब यह जिम्मेदारी सरकार तथा संबंधित संस्थाओं की है कि वे अपने वादों को अमल में लाएं।
अब निगाहें संसद और सरकार पर
अनशन समाप्त होने के बावजूद सोनम वांगचुक ने साफ किया कि यह आंदोलन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। उन्होंने कहा कि अब सबसे अहम बात यह होगी कि परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए किए गए वादे कितनी गंभीरता से लागू किए जाते हैं। देशभर के छात्र, अभिभावक और शिक्षा से जुड़े लोग अब इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि संसद में इस मुद्दे पर क्या चर्चा होती है और सरकार परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए कौन-कौन से ठोस कदम उठाती है।
सोनम वांगचुक का 26 दिनों का अनशन समाप्त हो चुका है, लेकिन परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग अभी भी कायम है। यदि सरकार और संसद अपने आश्वासनों को प्रभावी नीतियों और ठोस फैसलों में बदलती है, तो यह देश के लाखों छात्रों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में सभी की नजरें इस बात पर रहेंगी कि किए गए वादे व्यवहारिक रूप लेते हैं या नहीं।
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