Supreme Court Land Dispute: सुप्रीम कोर्ट ने करीब 70 साल पुराने भूमि विवाद का निपटारा करते हुए 4 जून 1957 की रजिस्टर्ड बिक्री डीड को वैध माना और चार पीढ़ियों से चली आ रही कानूनी लड़ाई का अंत कर दिया। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और एन.वी. अंजारिया की पीठ ने उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के नरसिपुर कलां गांव की 15.5 बीघा भूमि से जुड़े मामले में यह फैसला सुनाया।
क्या था मामला?
1957 में अपीलकर्ताओं के पूर्वजों ने, जो उस समय नाबालिग थे, यह जमीन खरीदी थी और तभी से कब्जे का दावा करते रहे। 1984 में उनके नाम म्यूटेशन हुआ। 1991 में चकबंदी के दौरान उन्होंने भूमिधर अधिकार की मांग की। शुरुआत में उनका दावा स्वीकार हुआ और 1993 के समझौते में भी उनके कब्जे को मान्यता मिली, लेकिन सह-भूधारकों की आपत्तियों के बाद मामला फिर खुल गया।
1999 में चकबंदी अधिकारी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि बिक्री डीड साबित नहीं हुई और यह उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की धारा 154 का उल्लंघन करती है। अपीलीय, पुनरीक्षण प्राधिकरण और 2017 में हाईकोर्ट ने भी यही फैसला बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि निचली अदालतों और अधिकारियों ने मामूली विसंगतियों के आधार पर बिक्री डीड को अमान्य ठहराकर स्पष्ट कानूनी त्रुटि की। अदालत ने कहा कि प्रतिवादियों ने कभी यह आरोप नहीं लगाया कि बिक्री डीड फर्जी थी, दबाव, धोखाधड़ी, प्रतिरूपण या छल से कराई गई थी। केवल गवाह के पते में मामूली अंतर के आधार पर वैध पंजीकृत दस्तावेज को खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता लगातार जमीन पर कब्जे का दावा करते रहे, जिसे प्रभावी ढंग से चुनौती नहीं दी गई। इसलिए बिक्री डीड की वैधता, उस पर लागू कानूनी अनुमान, धोखाधड़ी के आरोपों का अभाव और गवाह के बयान में कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास न होने के कारण निचली अदालतों के निष्कर्ष कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं हैं। कोर्ट ने सभी पूर्व आदेश रद्द करते हुए विवाद का अंतिम निपटारा कर दिया।
ये भी पढ़े: जानिए, PM Modi का सेशेल्स दौरा क्यों है इतना महत्वपूर्ण

