सुप्रीम कोर्ट का सख्त प्रहार,
Supreme Court's Action On Malda Incident: पश्चिम बंगाल के मालदा में न्यायिक अधिकारियों के घेराव और उन्हें घंटों तक बंधक बनाए जाने के मामले ने देश की सर्वोच्च अदालत को कड़ा रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है। Supreme Court of India ने इस घटना को बेहद गंभीर बताते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई और इसे “सोची-समझी साजिश” तक करार दिया।
मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें खुद देर रात तक हालात पर नजर रखनी पड़ी, तब जाकर प्रशासन हरकत में आया। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि घेराव में फंसे एक न्यायिक अधिकारी के साथ उसका छोटा बच्चा भी मौजूद था।
अदालत ने पश्चिम बंगाल को देश के सबसे ज्यादा ध्रुवीकृत राज्यों में से एक बताते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया को कमजोर करती हैं। कोर्ट के अनुसार, यह केवल विरोध प्रदर्शन नहीं बल्कि अधिकारियों का मनोबल तोड़ने की सुनियोजित कोशिश थी।
कोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी और जिला प्रशासन की भूमिका पर सख्त सवाल उठाए। जानकारी मिलने के बावजूद समय पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, इस पर अदालत ने नाराजगी जताई। रिपोर्ट के मुताबिक, दोपहर 3:30 बजे शुरू हुआ घेराव देर रात तक जारी रहा, लेकिन शुरुआती घंटों में प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा। जिला प्रशासन और पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को तलब किया।
घटना मालदा के कालीचक-II BDO कार्यालय की है, जहां बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने इमारत को चारों ओर से घेर लिया। कई न्यायिक अधिकारी अंदर फंसे रहे और बाहर निकलने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए। सड़कें जाम कर दी गईं, जिससे हालात और भी तनावपूर्ण हो गए। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने आरोप लगाया कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर थी और अधिकारियों की सुरक्षा गंभीर खतरे में थी। उन्होंने कहा कि प्रशासन को तुरंत अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात कर सुरक्षित निकासी सुनिश्चित करनी चाहिए थी।
दरअसल, यह पूरा विवाद SIR प्रक्रिया के बाद वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के आरोपों से जुड़ा है। विपक्षी दलों और कार्यकर्ताओं ने इसे लेकर कई जगह प्रदर्शन किए, जो कुछ स्थानों पर उग्र हो गए।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि न्यायिक अधिकारियों को इस तरह निशाना बनाना कानून के शासन के खिलाफ है और इसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने राज्य प्रशासन के रवैये को “निंदनीय” बताते हुए भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने के संकेत दिए। अब सबकी नजर इस पर है कि क्या राज्य सरकार अदालत के निर्देशों के बाद हालात संभाल पाएगी या यह विवाद और गहराएगा।
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