Kerala Vizhinjam Port: अडानी पोर्ट्स एंड SEZ (APSEZ) ने केरल के विझिंजम पोर्ट में अपनी 49% हिस्सेदारी स्विट्जरलैंड की कंटेनर शिपिंग कंपनी MSC Group की सहायक कंपनी मुंडी लिमिटेड (Mundi Ltd) को लगभग 1.397 अरब डॉलर (करीब 13,000 करोड़ रुपये) में बेचने का प्रस्ताव रखा है। यदि यह सौदा पूरा होता है, तो यह भारत के घरेलू बंदरगाह क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निजी निवेश होगा। हालांकि, इस प्रस्ताव ने केरल में राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा कर दिया है।
विझिंजम भारत का पहला डीप-वॉटर कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है, जिसका उद्देश्य भारत और क्षेत्रीय कार्गो को श्रीलंका के बजाय कम लागत पर संभालना है। यह परियोजना केरल सरकार और अडानी विझिंजम पोर्ट प्राइवेट लिमिटेड (AVPPL) के बीच डिजाइन, बिल्ड, फाइनेंस, ऑपरेट एंड ट्रांसफर (DBFOT) मॉडल पर विकसित की जा रही है।
17 अगस्त 2015 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने AVPPL के साथ रियायत (Concession) समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। कई देरी के बाद परियोजना का पहला चरण दिसंबर 2024 में शुरू हुआ। दूसरा चरण दिसंबर 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है। पहले चरण में बंदरगाह की क्षमता 10 लाख TEU प्रतिवर्ष है, जिसे अगले चरण में 30 लाख TEU तक बढ़ाया जाएगा।
पहले चरण में केरल सरकार ने 5,595 करोड़ रुपये, अडानी समूह ने 2,454 करोड़ रुपये निवेश किए, जबकि केंद्र सरकार ने 817 करोड़ रुपये की Viability Gap Funding दी। DBFOT समझौता 40 वर्षों के लिए है, जिसे आगे 20 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
30 जून को APSEZ ने SEBI को बताया कि उसने 29 जून को Mundi Ltd के साथ शेयर खरीद और सब्सक्रिप्शन समझौता किया है। Mundi, Terminal Investment Limited (TiL) की सहायक कंपनी है, जो MSC का टर्मिनल संचालन कारोबार संभालती है। हालांकि, शेयर हस्तांतरण की कोई समयसीमा तय नहीं की गई है और यह नियामकीय सहित आवश्यक मंजूरियों पर निर्भर करेगा।
राज्य सरकार का कहना है कि 49% हिस्सेदारी बेचना 'स्वामित्व में बदलाव (Change in Ownership)' की श्रेणी में आता है, जिसके लिए सरकार की पूर्व मंजूरी जरूरी है। मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने अडानी पोर्ट्स को इस पर राज्य की नाराजगी भी जताई। सरकार का कहना है कि विझिंजम को वैश्विक ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में विकसित करने का लक्ष्य है और सभी शिपिंग कंपनियों को समान अवसर मिलना चाहिए। उसे आशंका है कि दुनिया की सबसे बड़ी कंटेनर शिपिंग कंपनी MSC के आने से शिपिंग और कंटेनर ट्रैफिक में एकाधिकार (Monopoly) की स्थिति बन सकती है।
हालांकि, भारत की बंदरगाह नीति के तहत सभी टर्मिनलों को 'कॉमन-यूजर' मॉडल पर संचालित करना अनिवार्य है, यानी सभी जहाजों और शिपिंग कंपनियों को बिना भेदभाव सेवाएं देनी होंगी। TiL पहले से 2016 से मुंद्रा पोर्ट और 2023 से एन्नोर कंटेनर टर्मिनल में अडानी के साथ साझेदारी कर रही है, जहां एकाधिकार जैसी स्थिति नहीं बनी।
AVPPL ने 1 जुलाई को राज्य के बंदरगाह विभाग को इस सौदे की जानकारी दी। कंपनी का कहना है कि सूचीबद्ध कंपनी होने के कारण पहले SEBI को सूचित करना कानूनी रूप से जरूरी था।
समझौते के अनुसार, निर्माण अवधि और व्यावसायिक संचालन के पहले वर्ष तक अडानी को 51% हिस्सेदारी बनाए रखनी थी। इसके बाद उसे कम से कम 26% हिस्सेदारी रखना अनिवार्य है। अडानी का कहना है कि पोर्ट अब दूसरे वर्ष में प्रवेश कर चुका है, इसलिए वह अपनी 74% तक हिस्सेदारी घटा सकता है।
हालांकि, रियायत समझौता यह भी स्पष्ट करता है कि कुल 25% या उससे अधिक हिस्सेदारी के हस्तांतरण को स्वामित्व में बदलाव माना जाएगा और इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित के आधार पर राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी आवश्यक होगी। अंतिम निर्णय सरकार का होगा और वही कंपनी पर बाध्यकारी रहेगा। यदि विवाद उत्पन्न होता है, तो पहले सुलह (Conciliation) की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। समाधान न होने पर मामला इंटरनेशनल सेंटर फॉर अल्टरनेटिव डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन, नई दिल्ली के नियमों के तहत मध्यस्थता (Arbitration) में जाएगा।
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