Global FMCG product differences India: क्या आपने कभी महसूस किया है कि विदेश में खरीदा गया किसी ग्लोबल ब्रांड का वही प्रोडक्ट भारत में मिलने वाले प्रोडक्ट से स्वाद, खुशबू, टेक्सचर या सामग्री के मामले में अलग है? दरअसल, एक ही ब्रांड का हर देश में बिल्कुल एक जैसा फॉर्मूला होना जरूरी नहीं है। मुंबई की फूड साइंटिस्ट गौरी चेंबुरकर के मुताबिक कंपनियों के लिए हर बाजार में समान स्पेसिफिकेशन वाला प्रोडक्ट बेचना अनिवार्य नहीं है।
भारत में कई एयरेटेड ड्रिंक्स ज्यादा मीठे लगते हैं। भारत में मिलने वाली Vaseline की पेट्रोलियम जेली का टेक्सचर अमेरिका या ब्रिटेन के प्रोडक्ट से अलग हो सकता है। शैंपू और लोशन जैसे पर्सनल केयर प्रोडक्ट भी समान ब्रांडिंग के बावजूद अलग फॉर्मूले में मिलते हैं। इतना ही नहीं, भारतीय बाजार में इनकी कीमत भी कई विदेशी बाजारों से कम होती है। nइंपोर्टेड प्रोडक्ट रखने वाले हाई-एंड स्टोर में एक ही ब्रांड के भारतीय और विदेशी पैक की लेबलिंग की तुलना करने पर यह अंतर साफ नजर आ सकता है। सोशल मीडिया पर भी भारतीय उपभोक्ताओं ने ऐसे अनुभव साझा किए हैं और कई लोगों ने दावा किया है कि भारत में बिकने वाले प्रोडक्ट उन्हें विदेशों के मुकाबले कम गुणवत्ता वाले लगे।
हाल ही में Reuters की एक रिपोर्ट ने भी इस अंतर को रेखांकित किया। उदाहरण के लिए, Coca-Cola की Fanta में ब्रिटेन के मुकाबले भारत में काफी अधिक चीनी होती है। भारतीय Fanta में एक ऐसा कृत्रिम रंग भी इस्तेमाल होता है, जिसके इस्तेमाल पर यूरोप में प्रमुख स्वास्थ्य चेतावनी जरूरी है। चॉकलेट, सीरियल, इंस्टेंट फूड और यहां तक कि बेबी फॉर्मूला में भी अलग-अलग देशों में फॉर्मूलेशन के अंतर की शिकायतें सामने आती रही हैं। पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ भारतीय फॉर्मूलों में अधिक चीनी, कम कोको या दूध तथा अलग तरह के फैट और एडिटिव्स हो सकते हैं।
महाराष्ट्र FDA आयुक्त तुकाराम मुंडे ने भी वैश्विक खाद्य और पेय कंपनियों की अलग-अलग देशों में अलग पोषण मानक अपनाने की नैतिकता पर सवाल उठाए हैं। हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक इसे सीधे 'भारत में घटिया प्रोडक्ट' कहना सही नहीं होगा।
अलग देशों में एक ही प्रोडक्ट का फॉर्मूला क्यों बदलता है?
फूड साइंटिस्ट गौरी चेंबुरकर के अनुसार स्थानीय कच्चा माल, सोर्सिंग, उत्पादन प्रक्रिया, सरकारी नियम, लागत और उपभोक्ताओं की पसंद इसके प्रमुख कारण हैं। अलग-अलग देशों में कच्चे माल की उपलब्धता और गुणवत्ता अलग होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि भारत या ब्राजील जैसे गर्म क्षेत्रों में मिलने वाला शहद ठंडे इलाकों के शहद से अलग हो सकता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां लागत कम रखने के लिए स्थानीय स्तर पर सामग्री खरीदती हैं। यानी प्रोडक्शन शुरू होने से पहले ही किसी बाजार की आर्थिक परिस्थितियां फॉर्मूलेशन को प्रभावित करने लगती हैं।
अलग देशों के कच्चे माल से जुड़े नियम भी अलग होते हैं। ऐसे में एक देश में तैयार हुआ बिल्कुल वही प्रोडक्ट दूसरे देश में भेजना हमेशा व्यावहारिक नहीं होता। इसलिए कंपनियां हर बाजार के लिए अलग फॉर्मूला अपनाती हैं।
भारत की कम खरीद क्षमता भी बड़ा कारण
Vidyashilp University, Bengaluru की असिस्टेंट प्रोफेसर और अर्थशास्त्री तान्या साह के अनुसार एक ही ब्रांड का मतलब यह नहीं कि हर देश में प्रोडक्ट भी बिल्कुल एक जैसा होगा। कीमत, सामग्री की उपलब्धता, नियम और उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता फॉर्मूलेशन तय करने में अहम भूमिका निभाती है। 2025 में भारत की प्रति व्यक्ति GDP करीब 2,700 डॉलर थी, जबकि ब्रिटेन में यह लगभग 57,600 डॉलर और अमेरिका में करीब 90,000 डॉलर थी। इसलिए जिस महंगे और प्रीमियम फॉर्मूले को पश्चिमी बाजार में ग्राहक आसानी से खरीद सकते हैं, उसे भारत में उसी कीमत पर बेचना मुश्किल हो सकता है।
इसका मतलब यह नहीं कि कंपनियां जानबूझकर गरीब देशों के लिए घटिया प्रोडक्ट बनाती हैं। लेकिन सामग्री और स्पेसिफिकेशन तय करते समय वह कीमत जरूर महत्वपूर्ण होती है, जो किसी बाजार का उपभोक्ता चुका सकता है। चेंबुरकर ने आयरलैंड में Cadbury चॉकलेट के अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें यूरोपीय, खासकर स्विट्जरलैंड में बनी Cadbury का स्वाद और माउथफील पसंद है, लेकिन उसकी कीमत नहीं। भारत में वह Cadbury खरीदते समय जेब पर ज्यादा विचार नहीं करती थीं, जबकि आयरलैंड में महंगी होने के कारण उनका सेवन कम हो गया।
दूसरी ओर, कंपनियां भी इनपुट लागत नियंत्रित करती हैं। किसी सामग्री की कीमत बढ़ने पर वे नियमों के भीतर सस्ता विकल्प तलाश सकती हैं। यानी निर्माता लगातार सामग्री की लागत और ग्राहक की भुगतान क्षमता के बीच संतुलन बनाते हैं।
नियम भी बदल देते हैं प्रोडक्ट का फॉर्मूला
सरकारी नियम और टैक्स भी प्रोडक्ट की सामग्री बदलने की वजह बन सकते हैं। चेंबुरकर ने आयरलैंड में काम करने का अनुभव साझा करते हुए बताया कि कंपनियों को चीनी पर लगने वाले टैक्स जैसे नियमों को ध्यान में रखकर फॉर्मूला तैयार करना पड़ता था।
तरल प्रोडक्ट में घुली चीनी की मात्रा बताने वाले Brix स्तर के आधार पर टैक्स तय हो सकता है। इसलिए यूरोप में एनर्जी ड्रिंक कंपनियां भी Brix को निर्धारित सीमा से नीचे रखने की कोशिश करती हैं। उन्होंने एक सॉस कंपनी का उदाहरण भी दिया, जिसने अतिरिक्त चीनी से बचने के लिए प्राकृतिक शुगर वाले फलों का इस्तेमाल किया। इसलिए फॉर्मूलेशन में अंतर को अपने आप 'कम गुणवत्ता' नहीं माना जा सकता। टैक्स, उपलब्ध सामग्री, स्थानीय स्वाद और नियमों के कारण भी रेसिपी बदली जा सकती है।
तान्या साह के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय व्यापार और राजनीतिक अर्थव्यवस्था भी सामग्री की कीमत और उपलब्धता को प्रभावित करती है। उन्होंने कॉर्न का उदाहरण दिया। अमेरिका कॉर्न के सबसे बड़े उत्पादकों और उपभोक्ताओं में है। इससे कॉर्न सिरप और दूसरे स्वीटनर बनाए जाते हैं, लेकिन कॉर्न का इस्तेमाल पशु आहार जैसी दूसरी जरूरतों में भी होता है। भारत में घरेलू उपलब्धता, आयात लागत और व्यापार समझौतों के कारण इसकी कीमत और आपूर्ति अलग हो सकती है, जिससे खाद्य उत्पादों में इसका इस्तेमाल प्रभावित होता है।
क्या अलग फॉर्मूला मतलब कम गुणवत्ता?
जरूरी नहीं। यह इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। चेंबुरकर के अनुसार किसी चॉकलेट में ज्यादा चीनी, कम कोको या अलग फैट होने भर से उसे घटिया नहीं कहा जा सकता। पैकेज्ड फूड की गुणवत्ता को तीन स्तरों पर समझना चाहिए—पहला, फूड सेफ्टी; दूसरा, केमिकल कंपोजिशन, यानी सामग्री और पोषण लेबल पर दी गई जानकारी; और तीसरा, सेंसरी अपील, यानी स्वाद, खुशबू और टेक्सचर।
स्थानीय स्वाद तीसरे पहलू को काफी प्रभावित करता है। चेंबुरकर के मुताबिक विदेशों में कम चीनी या कम नमक वाले कई प्रोडक्ट भारतीय स्वाद के हिसाब से अच्छे नहीं लग सकते। कंपनियां मार्केट रिसर्च के जरिए पता लगाती हैं कि स्थानीय उपभोक्ता किस स्वाद या टेक्सचर को पसंद करते हैं। तान्या साह के अनुसार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को उन स्थानीय कंपनियों से भी मुकाबला करना पड़ता है, जो दशकों से भारतीय उपभोक्ताओं के स्वाद, सप्लाई चेन और उत्पादन व्यवस्था को समझती हैं। इसलिए ग्लोबल कंपनियों को भी इन्हीं परिस्थितियों के अनुरूप प्रोडक्ट बनाना पड़ता है।
सिर्फ खाने में नहीं, शैंपू-लोशन में भी अंतर
मार्केट के अनुसार फॉर्मूलेशन बदलने की रणनीति पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स में भी देखने को मिलती है। जलवायु, बाल और त्वचा के प्रकार, स्थानीय नियम, सामग्री की उपलब्धता और ग्राहकों की पसंद इसके पीछे हो सकते हैं।
Procter & Gamble का Head & Shoulders इसका उदाहरण है। अमेरिका और कुछ अन्य बाजारों में इसके एंटी-डैंड्रफ फॉर्मूले में आमतौर पर pyrithione zinc इस्तेमाल होता है। लेकिन यूरोपीय संघ ने 2022 में इसे कॉस्मेटिक्स में प्रतिबंधित कर दिया। इसके बाद यूरोपीय बाजार में Head & Shoulders के प्रोडक्ट्स में piroctone olamine जैसे दूसरे एंटी-डैंड्रफ ingredients इस्तेमाल किए जाने लगे। खुशबू भी स्थानीय पसंद का हिस्सा है। Bioderma और Cetaphil जैसे ब्रांड पश्चिमी बाजारों में कई fragrance-free या हल्की खुशबू वाले प्रोडक्ट बेचते हैं। Vaseline के भी वहां कम खुशबू या fragrance-free विकल्प मिलते हैं।
इसके उलट भारत में ब्यूटी और पर्सनल केयर कैटेगरी में खुशबू खरीदारी के फैसले को प्रभावित कर सकती है। Mintel की India Fragrance Trends in Beauty and Personal Care रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय उपभोक्ताओं के लिए fragrance महत्वपूर्ण हो सकती है। इसलिए भारत में उसी ब्रांड की क्रीम, फेसवॉश या मॉइस्चराइजर अधिक सुगंध वाला मिल सकता है। यह भी अपने आप में कम गुणवत्ता का प्रमाण नहीं है। खुशबू किसी प्रोडक्ट के sensory experience का हिस्सा है और अलग-अलग देशों में ग्राहक की पसंद अलग होती है। Unilever जैसी कंपनियों ने भारत में स्थानीय fragrance innovation hubs में निवेश भी किया है, क्योंकि खुशबू, सांस्कृतिक पसंद और जलवायु प्रोडक्ट की मांग और प्रदर्शन को प्रभावित करते हैं।
जब बात खाने की हो तो FSSAI की भूमिका अहम
फूड और बेवरेज के मामले में मामला केवल फॉर्मूला बदलने तक सीमित नहीं रहता। यहां यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि भारत में कंपनियों को खाद्य पदार्थों में कौन-सी सामग्री इस्तेमाल करने की कानूनी अनुमति है। Food Safety and Standards Authority of India यानी FSSAI खाद्य सुरक्षा, सामग्री और एडिटिव्स से जुड़े मानक तय करने के साथ यह भी निर्धारित करता है कि उपभोक्ताओं को पैकेज पर क्या जानकारी दी जाए।
तान्या साह का कहना है कि भारत को सिर्फ यह सुनिश्चित करने से आगे बढ़ना होगा कि खाना सुरक्षित है। अब यह भी देखना जरूरी है कि लोग जिस भोजन का सेवन कर रहे हैं, उसकी पोषण गुणवत्ता कैसी है। खासकर ultra-processed foods (UPFs) को लेकर यह सवाल महत्वपूर्ण है। कोई प्रोडक्ट मौजूदा नियमों के मुताबिक कानूनी रूप से सही हो सकता है, लेकिन उसका लगातार सेवन खराब डाइटरी परिणामों से जुड़ सकता है। साह ने मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज के बढ़ते बोझ के साथ पोषण संबंधी कमियों का भी जिक्र किया।
उनका मानना है कि FSSAI को पोषण मानकों और उनके अमल पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। केवल पैकेट के पीछे ingredients और calories की जानकारी छाप देने से यह जरूरी नहीं कि उपभोक्ता आसानी से समझ जाए कि वह क्या खा रहा है।
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर सरकार और कंपनियां आमने-सामने
LocalCircles के सह-संस्थापक सचिन तपारिया के मुताबिक 2022 में संगठन के एक सर्वे के बाद FSSAI ने भारतीय उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों की जानकारी देने के तरीके पर चर्चा शुरू की थी। 2023 में FSSAI ने स्टार-रेटिंग सिस्टम का प्रस्ताव रखा, जिसका LocalCircles ने विरोध किया और ज्यादा स्पष्ट warning labels की मांग की। तपारिया के अनुसार अदालतों के हस्तक्षेप के बाद FSSAI अब ज्यादा फैट, चीनी और नमक वाले यानी HFSS foods पर लाल लेबल की दिशा में बढ़ रहा है। LocalCircles के सर्वे में 94% उपभोक्ताओं ने कहा कि ऐसे लाल लेबल उन्हें ज्यादा सूचित खाद्य विकल्प चुनने में मदद करेंगे।
Reuters के पत्रकार आदित्य कलरा ने भी अलग-अलग देशों में एक ही ब्रांड की लेबलिंग का अंतर दिखाया। ब्रिटेन में बिकने वाले कई Maggi पैकेट भारत में ही बनते हैं, लेकिन उन पर ज्यादा नमक की चेतावनी वाला लाल फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल होता है। ब्रिटेन में यह लेबलिंग स्वैच्छिक है और Nestle 2013 से अपने पैकेटों पर इसका इस्तेमाल कर रही है। भारत में Nestle उन उद्योग संगठनों का हिस्सा है, जिन्होंने अनिवार्य फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल के प्रस्तावों का विरोध किया है।
FSSAI की कार्रवाई और बड़ी कंपनियों पर दबाव
FSSAI ने हाल में Nestle India, PepsiCo और Coca-Cola India समेत कई कंपनियों को कथित भ्रामक विज्ञापन, गलत दावों और लेबलिंग नियमों के उल्लंघन को लेकर 150 से अधिक नोटिस जारी किए। नियामक के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में कई Food Business Operators के खिलाफ खाद्य सुरक्षा कानूनों के उल्लंघन पर कार्रवाई की गई।
इस सूची में Abbott India, Red Bull India, Danone India, Monster Energy India, Hell Energy और Mondelez India भी शामिल हैं। FSSAI और बड़ी खाद्य कंपनियों के बीच टकराव नया नहीं है। 2015 में FSSAI ने Nestle की Maggi की सभी नौ स्वीकृत वैरायटी वापस लेने का आदेश दिया था और उन्हें मानव उपभोग के लिए असुरक्षित व खतरनाक बताया था। इससे पता चलता है कि नियामक बड़ी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने की क्षमता रखता है।
हालांकि, उसकी सीमाओं पर भी सवाल हैं। भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार ग्लोबल और भारतीय खाद्य कंपनियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए ऐसे नियम जिनसे स्थापित कारोबारी मॉडल प्रभावित हो सकते हैं, उनके खिलाफ इंडस्ट्री लॉबी का दबाव भी रहता है। फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को लेकर कंपनियों का विरोध इसका उदाहरण है।
क्या भारत को पश्चिमी देशों की नकल करनी चाहिए?
विशेषज्ञों का कहना है कि लक्ष्य सिर्फ पश्चिमी बाजारों की नकल करना नहीं होना चाहिए। गौरी चेंबुरकर के अनुसार सवाल यह नहीं होना चाहिए कि भारत का प्रोडक्ट विदेश में बिकने वाले प्रोडक्ट जैसा बिल्कुल क्यों नहीं है, बल्कि यह होना चाहिए कि भारतीय संसाधनों और परिस्थितियों का इस्तेमाल करके भारतीय उपभोक्ताओं के लिए बेहतर प्रोडक्ट कैसे बनाया जाए। उन्होंने दूध का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि अगर भारत में अच्छी गुणवत्ता वाला दूध उपलब्ध है तो चॉकलेट और आइसक्रीम में मिल्क सॉलिड्स का बेहतर इस्तेमाल क्यों नहीं हो सकता। उन्होंने frozen dessert और ice-cream के बीच के अंतर की ओर भी इशारा किया।
तान्या साह के अनुसार भारत में बदलती खान-पान की आदतों को समझने के लिए ज्यादा विस्तृत dietary surveys की जरूरत है। सरकारी सर्वे अक्सर गेहूं, चावल और दाल जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों पर केंद्रित रहे हैं, जबकि पैकेज्ड स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स और मीठे पेय पदार्थों की खपत को पर्याप्त विस्तार से समझना कठिन है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में खान-पान तेजी से बदल रहा है।
निष्कर्ष
इसलिए किसी ग्लोबल ब्रांड का भारतीय प्रोडक्ट विदेशी प्रोडक्ट से अलग होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह घटिया है। पर्सनल केयर में अलग active ingredients, टेक्सचर या fragrance स्थानीय नियमों और पसंद के कारण हो सकते हैं। वहीं खाद्य और पेय पदार्थों में मामला ज्यादा गंभीर है, क्योंकि इनका सीधा संबंध करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य और पोषण से है। असल सवाल यह है कि क्या भारतीय उपभोक्ताओं को उनकी परिस्थितियों के हिसाब से बेहतर और सुरक्षित प्रोडक्ट मिल रहे हैं और क्या उन्हें अपनी पसंद का सही फैसला लेने के लिए पर्याप्त और स्पष्ट जानकारी दी जा रही है?

