Sharjeel Imam bail: दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने कार्यकर्ता शरजील इमाम को 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में 10 दिन की अंतरिम जमानत दी है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने यह आदेश दिया ताकि इमाम अपने भाई की शादी में शामिल हो सकें और अपनी बीमार मां की देखभाल कर सकें। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जमानत केवल सीमित अवधि के लिए है और इमाम को अदालत के निर्देशानुसार वापस आना होगा।
शरजील इमाम 2020 में दिल्ली में हुए दंगों में आरोपियों में शामिल थे। इससे पहले जामिया मिलिया इस्लामिया हिंसा मामले में अदालत ने उनके खिलाफ आरोप तय किए थे। अदालत ने यह भी पाया कि इमाम न केवल हिंसा भड़काने वाले थे, बल्कि कथित तौर पर हिंसा से जुड़े व्यापक षड्यंत्र में भी शामिल थे।
विशेष रूप से, अदालत ने 13 दिसंबर, 2019 को जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के पास दिए गए उनके भाषण की जांच की थी, जिसे उन्होंने अत्यधिक उत्तेजक माना गया। इस भाषण के दौरान, भीड़ के जुटने और बाद में हुए दंगों को अचानक या आकस्मिक घटना नहीं माना गया, बल्कि एक संगठित साजिश के रूप में देखा गया।
शरजील इमाम के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। आरोपों में शामिल हैं:
7 मार्च को अदालत ने कहा कि 13 दिसंबर, 2019 को हुए दंगों और भीड़ के जमावड़े को आकस्मिक घटना नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि इतनी बड़ी अशांति बिना योजना के नहीं हो सकती थी। इसके पीछे भीड़ का नेतृत्व करने वाले और उसे भड़काने वाले लोग शामिल थे, जबकि अन्य लोग बाद में शामिल हुए।
अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि इमाम के 13 दिसंबर, 2019 के भाषण ने लोगों को “चक्का जाम” या सार्वजनिक मार्गों को बंद करने के लिए उकसाया। अदालत ने पाया कि इमाम, जो उस समय पीएचडी के वरिष्ठ छात्र थे, ने अपने भाषण के माध्यम से मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को संबोधित किया, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से अन्य लोगों को भी निशाना बनाया।
अदालत ने पिछली टिप्पणियों में कहा कि भाषण का उद्देश्य आक्रोश पैदा करना था और इससे बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होकर सार्वजनिक सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर सकते थे। इस प्रकार, इमाम के कथित तौर पर भाषण और गतिविधियों को दंगे की साजिश से जोड़कर देखा गया।
अंतरिम जमानत के तहत इमाम को केवल 10 दिनों के लिए हिरासत से बाहर रहने की अनुमति दी गई है। इस दौरान उन्हें अदालत के आदेशों का पालन करना होगा और निर्दिष्ट अवधि में वापस आना अनिवार्य है। अदालत ने यह राहत परिवारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दी, ताकि इमाम अपने भाई की शादी में शामिल हो सकें और बीमार मां की देखभाल कर सकें।
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