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वादे की हत्या और हरियाली का कत्लेआम: कटर मशीनों के शोर में दबा आदिवासियों का रुदन, JSPL का आश्वासन निकला सफेद झूठ!

JSPL Tree Cutting: रायगढ़ विकास की अंधी दौड़ में जब कॉरपोरेट की भूख और सत्ता की खामोशी का गठजोड़ होता है, तो सबसे पहले प्रकृति और हाशिए पर खड़े आम इंसान के अधिकारों की बलि चढ़ाई जाती है। रायगढ़ जिले के तमनार ब्लॉक अंतर्गत नागरामुड़ा के जंगलों में आज जो कुछ भी हुआ, वह केवल पेड़ों की कटाई नहीं थी, बल्कि यह लोकतंत्र, ग्राम सभा के अधिकारों और एक बड़े कॉरपोरेट घराने द्वारा किए गए वादों की सरेआम हत्या थी। जिस जंगल को बचाने के लिए आदिवासी समाज और स्थानीय ग्रामीण अपने प्राणों की आहुति देने को तत्पर हैं, आज उसी जंगल की छाती पर भारी-भरकम कटर मशीनें चला दी गईं। नागरामुड़ा का वह शांत और हरा-भरा जंगल, जो कल तक ग्रामीणों की आजीविका और आस्था का केंद्र था, आज सुबह कटर मशीनों की कानफोड़ू और भयावह आवाजों से दहल उठा। जिंदल पावर लिमिटेड (JSPL) के कर्मचारियों का भारी लाव-लश्कर, पूरी प्रशासनिक और पुलिसिया शह के साथ, पेड़ों को धराशायी करने के इरादे से जंगल में घुस आया।

सदियों पुराने पेड़ों पर चली आरी

ग्रामीणों के लिए यह दृश्य किसी दुस्वप्न से कम नहीं था। सदियों पुराने पेड़, जिन्हें उन्होंने अपने बच्चों की तरह सहेजा और पाला था, उनके आंखों के सामने चंद मिनटों में ठूंठ में तब्दील किए जा रहे थे। इस विनाशलीला की खबर जैसे ही जंगल की आग की तरह आसपास के गांवों में फैली, ग्रामीण अपना सारा काम-काज छोड़कर, अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए दौड़ पड़े। महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं का हुजूम एक बार फिर कॉरपोरेट की इन मशीनों के सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया। लेकिन इस बार का यह टकराव केवल एक तात्कालिक विरोध नहीं है, बल्कि यह एक गहरे धोखे और विश्वासघात के खिलाफ उपजा वह ज्वालामुखी है, जिसकी आंच अब दूर तक महसूस की जा रही है। यह सवाल अब सिर्फ एक खदान का नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल उस भरोसे का है, जिसे व्यवस्था और कंपनी प्रबंधन ने बड़ी बेरहमी से तोड़ा है।

JSPL पर भरोसा टूटा

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चौंकाने वाली और आक्रोशित करने वाली बात जेएसपीएल (JSPL) प्रबंधन का वह सफेद झूठ है, जिसे चंद दिनों पहले ही पूरी बेशर्मी के साथ सार्वजनिक मंच से बोला गया था। याद दिलाना आवश्यक है कि इसी महीने की शुरुआत में, 1 जुलाई को जेएसपीएल तमनार के जनसंपर्क अधिकारी (PRO) ने मीडिया और ग्रामीणों के सामने यह स्पष्ट और दोटूक शब्दों में कहा था कि "परियोजना के लिए किसी भी कीमत पर पेड़ों की कटाई नहीं की जाएगी।" इस बयान के बाद ग्रामीणों ने थोड़ी राहत की सांस ली थी और उन्हें लगा था कि शायद कंपनी और प्रशासन को उनकी आजीविका और पर्यावरण की फिक्र है। लेकिन आज जब वही कंपनी अपने पूरे दल-बल और अत्याधुनिक कटर मशीनों के साथ उसी जंगल का सीना चीरने पहुंच गई, तो पीआरओ का वह बयान महज़ एक कूटनीतिक छलावा साबित हुआ। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि 1 जुलाई को दिया गया वह आश्वासन केवल उनके उग्र होते आंदोलन को शांत करने और उनकी एकजुटता को तोड़ने की एक सोची-समझी साजिश थी। कंपनी ने वक्त खरीदा और आज पीछे से पीठ में छुरा घोंपने का काम किया है।

वादाखिलाफी के आरोपों से घिरी JSPL

अब सवाल यह उठता है कि क्या कॉरपोरेट घरानों के लिए झूठ बोलना और स्थानीय जनता को गुमराह करना इतना आसान हो गया है? क्या पीआरओ का वह बयान सिर्फ कागजी खानापूर्ति और मीडिया को शांत करने का एक हथकंडा था? आज जो पेड़ काटे जा रहे हैं, क्या वे उस वादे की चिता पर नहीं काटे जा रहे हैं? ग्रामीणों के भीतर पल रहा यह गुस्सा केवल अपनी ज़मीन छिनने का नहीं है, बल्कि उस धोखे का है जो एक बड़े औद्योगिक घराने ने उनके साथ किया है। जब एक जिम्मेदार अधिकारी सार्वजनिक रूप से मुकर सकता है, तो फिर विस्थापन, पुनर्वास और मुआवजे के जिन बड़े-बड़े पैकेजों का दावा यह कंपनी करती है, उस पर कोई भी ग्रामीण कैसे भरोसा कर सकता है? यह घटना सिद्ध करती है कि कंपनी की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है, और उनका एकमात्र उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण इस कोयला खदान को शुरू करना है, चाहे इसके लिए उन्हें कितने भी झूठ क्यों न बोलने पड़ें।

प्रशासन की भूमिका पर उठे बड़े सवाल

इस पूरी कॉरपोरेट गुंडागर्दी के बीच सबसे बड़ा और सुलगता हुआ सवाल राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर खड़ा होता है। जब नागरामुड़ा के जंगलों में कानून की धज्जियां उड़ाते हुए, बिना ग्राम सभा की उचित अनुमति के कटर मशीनें चल रही थीं, तब प्रशासन कहां था? क्या सरकार ऐसे ही मूकदर्शक बनकर चुप बैठी रहेगी? क्या सत्ता के गलियारों में बैठे नुमाइंदों को उन आदिवासियों की चीखें सुनाई नहीं दे रही हैं, जो आज अपनी आजीविका छिनने के डर से मशीनों के आगे लेट रहे हैं? यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस पुलिस और प्रशासन का काम आम जनता के अधिकारों की रक्षा करना है, वह आज कॉरपोरेट के लठैत की तरह काम करती नजर आ रही है। भारी पुलिस बल की मौजूदगी में पेड़ों की कटाई इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि प्रशासन ने कंपनी के सामने पूरी तरह से घुटने टेक दिए हैं।

क्या यही है विकास का मॉडल?

सरकारें चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हों, चुनाव के समय आदिवासियों के विकास, उनके जल-जंगल-जमीन की रक्षा और 'न्याय' के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन आज नागरामुड़ा में जो कुछ भी हो रहा है, क्या यही न्याय है? क्या न्याय का मतलब यही है कि कॉरपोरेट की तिजोरियां भरने के लिए लाखों पेड़ों की बलि चढ़ा दी जाए और पीढ़ियों से वहां निवास कर रहे मूलनिवासियों को दर-ब-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया जाए? सरकार की यह चुप्पी केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह एक मौन स्वीकृति है कि विकास के इस क्रूर मॉडल में आदिवासियों और पर्यावरण के लिए कोई जगह नहीं है। यह खामोशी उन तमाम संवैधानिक प्रावधानों का भी अपमान है, जो पेसा (PESA) कानून के तहत पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में आदिवासियों को अपनी जमीन और संसाधनों पर एकाधिकार प्रदान करते हैं।

हरियाली की कीमत पर विकास?

पर्यावरण संरक्षण के नजरिए से देखें तो यह एक भयानक त्रासदी की शुरुआत है। करीब 1 लाख पेड़ों की कटाई कोई सामान्य घटना नहीं है। यह एक पूरे के पूरे पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) का विनाश है। नागरामुड़ा और आसपास के जंगल केवल लकड़ी का ढेर नहीं हैं, बल्कि यह यहां के मौसम, भूजल स्तर और जैव विविधता के रक्षक हैं। आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी वैश्विक महामारियों से जूझ रही है। ऐसे समय में जब एक-एक पेड़ बचाना मानवता के लिए आवश्यक हो गया है, तब लाखों की संख्या में हरे-भरे पेड़ों को कटर मशीनों से काटना किसी आत्मघाती कदम से कम नहीं है। इन जंगलों के कटने से न केवल वहां का तापमान बेतहाशा बढ़ेगा, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में पानी का गंभीर संकट भी पैदा हो जाएगा, जिसका असर सिर्फ इन ग्रामीणों पर ही नहीं, बल्कि पूरे रायगढ़ जिले पर पड़ेगा।

आदिवासियों की आजीविका और अस्तित्व पर गहराया संकट!

आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से यह कटाई आदिवासियों की कमर तोड़ने वाली है। इन क्षेत्रों में रहने वाले हजारों परिवारों की आजीविका सीधे तौर पर इन जंगलों पर निर्भर है। महुआ, तेंदूपत्ता, चार-चिरौंजी, साल बीज और अन्य वनोपज एकत्र कर ये ग्रामीण अपना जीवन यापन करते हैं। ये जंगल उनका बैंक हैं, उनकी तिजोरी हैं। खदान के लिए होने वाली इस कटाई से 14 से 83 गांवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। जब ये पेड़ कट जाएंगे, तो ये परिवार कहां जाएंगे? कंपनी और प्रशासन भले ही मुआवजे की बात करें, लेकिन सच यह है कि कोई भी आर्थिक मुआवजा पीढ़ियों की इस प्राकृतिक संपदा और संस्कृति का विकल्प नहीं हो सकता। इसके अलावा, पड़ोसी राज्य ओडिशा का उदाहरण सामने है, जहां ऐसी ही परियोजनाओं के लिए बेहतर नीतियां अपनाई गई हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में आदिवासियों को केवल लाठियां, झूठे वादे और विस्थापन का दंश मिल रहा है।

कटाई से 14 से 83 गांवों के भविष्य पर सवाल

आज के इस घटनाक्रम ने क्षेत्र के हालात को एक बार फिर बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है। ग्रामीणों का धैर्य अब जवाब दे रहा है। जब वे देखते हैं कि शांतिपूर्ण विरोध और ग्राम सभा के प्रस्तावों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाता है, तो उनके भीतर का आक्रोश सड़कों पर उतरने को मजबूर होता है। पिछले साल दिसंबर में लिबरा और धौराभाठा में हुए हिंसक प्रदर्शनों की यादें अभी भी ताजा हैं। उस वक्त भी प्रशासन की ऐसी ही हठधर्मिता के कारण हालात बेकाबू हो गए थे, जिसमें कई पुलिसकर्मी और ग्रामीण घायल हुए थे। आगजनी और तोड़फोड़ की वह स्थिति एक चेतावनी थी, लेकिन लगता है कि न तो जिंदल प्रबंधन ने उससे कोई सबक लिया है और न ही जिला प्रशासन ने। अगर इसी तरह धोखेबाजी और बलपूर्वक कटाई का काम जारी रहा, तो नागरामुड़ा में भी हालात नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं। ग्रामीण अपनी अस्मिता और अस्तित्व की इस लड़ाई में पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

अब फैसला सरकार को करना है

अंततः यह लड़ाई सिर्फ नागरामुड़ा के चंद ग्रामीणों की नहीं रह गई है। यह कॉरपोरेट की असीमित लालच बनाम प्रकृति और मनुष्य के सह-अस्तित्व की लड़ाई है। पीआरओ पवन शर्मा का वह झूठा वादा इस बात का प्रतीक बन गया है कि कॉरपोरेट व्यवस्थाएं अपने फायदे के लिए किस हद तक गिर सकती हैं। सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह तत्काल प्रभाव से इस अवैध और अनैतिक कटाई पर रोक लगाए। मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए कि किस आधार पर और किन अधिकारियों की मिलीभगत से आज यह कटाई शुरू की गई। अगर सरकार सच में 'न्याय' के सिद्धांत पर चलती है, तो उसे कॉरपोरेट के दबाव से मुक्त होकर अपने राज्य के नागरिकों के पक्ष में खड़ा होना होगा। वरना, इतिहास इस बात को दर्ज करेगा कि जब रायगढ़ के जंगल कटर मशीनों से चीरे जा रहे थे, तब वहां की व्यवस्था और हुक्मरान अपनी आंखें मूंदकर किसी बड़े मुनाफे का हिसाब लगा रहे थे। नागरामुड़ा का यह संघर्ष अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां से पीछे हटने का मतलब है अपना सब कुछ खो देना, और ग्रामीण यह बात बहुत अच्छी तरह से समझ चुके हैं।

रिपोर्ट/अमर सदाना

Sunil Gupta

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