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महाशक्तियों की राजनीति में ‘मोहरा’ बना पाकिस्तान, खुद की अर्थव्यवस्था बेहाल: रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी

Iran War update: ईरान और अमेरिका-इज़रायल के बीच पिछले 7 सप्ताह से युद्ध जारी है। इस युद्ध का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। साउथ एशिया के देशों पर इसका प्रभाव देखने को मिला। पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों में कच्चा तेल और एलपीजी को लेकर संकट गहराता नजर आ रहा है। हालांकि, इस वैश्विक राजनीति के जटिल और बदलते समीकरणों में अमेरिका, चीन, पाकिस्तान और ईरान जैसे देशों के हित किस तरह टकराते और नए गठजोड़ बनाते हैं, यह समझना आसान नहीं है। इसी अहम विषय पर रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी ने न्यूज़ इंडिया 24X7 के पोडकास्ट में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कैसे पाकिस्तान को एक रणनीतिक ठिकाने की तरह इस्तेमाल किया गया, जबकि चीन बिना सीधे टकराव के अपनी आर्थिक शक्ति से दुनिया में प्रभाव बढ़ा रहा है। यह बातचीत सिर्फ एक संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि तेल की राजनीति, महाशक्तियों की चाल और भारत के सामने खड़ी चुनौतियों को गहराई से उजागर करती है।

मेरिका-चीन-ईरान के बीच संसाधनों और शक्ति की जंग

ईरान की स्थिति पर उन्होंने कहा कि लंबे समय से प्रतिबंध झेलने के बावजूद ईरान ने अपनी सैन्य और रणनीतिक ताकत को बनाए रखा है। हालांकि हालिया हमलों से उसके इंफ्रास्ट्रक्चर और नेतृत्व को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन उसका मनोबल अभी भी मजबूत है, जो उसे संघर्ष में टिके रहने की क्षमता देता है। चीन की रणनीति पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि चीन सीधे टकराव से बचते हुए अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान देता है। वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और व्यापार में उसकी पकड़ ही उसकी असली ताकत है, इसलिए वह युद्ध के बजाय आर्थिक विस्तार को प्राथमिकता देता है।

अमेरिका की ‘डीप स्टेट’ रणनीति

अंत में जनरल कुलकर्णी ने अमेरिका की रणनीति को ‘डीप स्टेट’ का हिस्सा बताते हुए कहा कि राष्ट्रपति केवल एक चेहरा होते हैं, जबकि असली फैसले लंबे समय की राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। उनका मानना है कि आने वाले समय में यह संघर्ष नए रूप में जारी रहेगा, जहां हर देश अपने हितों के हिसाब से कदम उठाएगा। जनरल कुलकर्णी ने खाड़ी देशों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ये देश भले ही छोटे हों, लेकिन वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में इनकी अहम हिस्सेदारी है। अमेरिका द्वारा इन देशों को भारी मात्रा में सैन्य सहायता देने का उद्देश्य केवल उनकी सुरक्षा नहीं, बल्कि क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखना भी है।

युद्ध के बाद भी जारी रहेंगी आर्थिक और वैश्विक चुनौतियां

उन्होंने मुस्लिम ब्रदरहुड और इस्लामिक देशों के आपसी संबंधों पर भी चर्चा की। कुलकर्णी के मुताबिक, भले ही बाहरी तौर पर एकजुटता दिखाई देती हो, लेकिन अंदरूनी स्तर पर इन देशों के बीच गहरे मतभेद और अविश्वास मौजूद हैं, जो समय-समय पर सामने आते रहते हैं। आने वाले समय की स्थिति पर उन्होंने कहा कि भले ही युद्ध थम जाए, लेकिन उसके प्रभाव लंबे समय तक बने रहेंगे। खासकर वैश्विक सप्लाई चेन, ऊर्जा संकट और आर्थिक अस्थिरता जैसी चुनौतियां कई देशों के सामने खड़ी रहेंगी, जिनसे निपटने के लिए सभी को रणनीतिक तैयारी करनी होगी।

Sunil Gupta

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