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सऊदी पर हूती हमले के बीच पाकिस्तान क्यों है खामोश? मक्का डिफेंस पैक्ट की होगी असली परीक्षा

by | Sep 9, 2026 | दुनिया

Saudi Arabia Houthi Attack: सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के बीच पाकिस्तान की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. दोनों देशों के बीच हुए मक्का डिफेंस पैक्ट के बाद यह पहला बड़ा मौका माना जा रहा है, जब पाकिस्तान की सुरक्षा प्रतिबद्धता पर सवाल उठ रहे हैं.

नई दिल्ली: सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है. हूती लड़ाकों की ओर से सऊदी क्षेत्र और लाल सागर के आसपास ड्रोन और मिसाइल हमलों की खबरों के बीच पाकिस्तान की प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें हैं. खास तौर पर इसलिए क्योंकि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच आपसी रक्षा सहयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौता हो चुका है.

हमलों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सऊदी अरब पर हमला होता है तो क्या पाकिस्तान सैन्य रूप से उसके साथ खड़ा होगा? फिलहाल इस्लामाबाद की ओर से सीधे सैन्य हस्तक्षेप के संकेत नहीं मिले हैं. पाकिस्तान का रुख उसकी पुरानी सुरक्षा नीति और यमन संघर्ष को लेकर 2015 में लिए गए फैसले से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है.

सऊदी अरब पर हूतियों ने किया हमला

हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब के खिलाफ ड्रोन और मिसाइल हमलों की जानकारी सामने आई है. लाल सागर के आसपास समुद्री गतिविधियों को लेकर भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ी हैं.

हमलों के कारण कुछ इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई है और समुद्री मार्गों को लेकर भी सतर्कता बरती जा रही है. सऊदी अरब के लिए लाल सागर क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां से तेल और दूसरे सामानों का अंतरराष्ट्रीय कारोबार होता है.

मक्का डिफेंस पैक्ट क्या है?

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग को लेकर हुए समझौते को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है. इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है.

तुर्किये की भागीदारी के बाद इस समझौते को अनौपचारिक तौर पर मक्का डिफेंस पैक्ट के नाम से भी जाना जाने लगा. समझौते में आपसी सुरक्षा सहयोग को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है. इसी वजह से सऊदी अरब पर हूती हमलों को इस समझौते की वास्तविक परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है.

पाकिस्तान सीधे सैन्य कार्रवाई से क्यों बच रहा है?

पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए उसकी पुरानी विदेश और सुरक्षा नीति पर नजर डालना जरूरी है. इस्लामाबाद पहले भी यह संकेत देता रहा है कि सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता या पवित्र स्थलों पर सीधा खतरा पैदा होने की स्थिति अलग होगी.

दूसरी ओर, हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरना पाकिस्तान के लिए बेहद संवेदनशील फैसला हो सकता है. यमन और लाल सागर का संघर्ष पहले से ही कई क्षेत्रीय शक्तियों को प्रभावित कर रहा है. ऐसे में पाकिस्तान के लिए इसमें सैन्य रूप से शामिल होना नए रणनीतिक और राजनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है.

2015 में भी पाकिस्तान ने अपनाया था तटस्थ रुख

यमन युद्ध के दौरान 2015 में सऊदी अरब ने पाकिस्तान से सैन्य सहायता मांगी थी. उस समय पाकिस्तान की संसद में इस मुद्दे पर लंबी चर्चा हुई थी.

संसद ने यमन संघर्ष में सीधे शामिल होने के बजाय तटस्थ रहने का फैसला किया था. हालांकि, साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि अगर सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता या मक्का-मदीना को सीधा खतरा होता है तो पाकिस्तान उसके साथ खड़ा हो सकता है.

यही पुराना रुख आज भी पाकिस्तान के मौजूदा रवैये को समझने में अहम माना जा रहा है.

क्या मक्का पैक्ट की होगी परीक्षा?

सऊदी अरब पर हूती हमले ऐसे समय में हुए हैं जब पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक संबंध पहले से मजबूत हैं. इसलिए पाकिस्तान की ओर से किसी भी सैन्य कदम या उसके अभाव को काफी करीब से देखा जा रहा है.

फिलहाल पाकिस्तान सीधे युद्ध में उतरने के बजाय कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर प्रतिक्रिया देने की नीति पर चलता दिखाई दे रहा है. आने वाले दिनों में अगर सऊदी अरब पर हमले बढ़ते हैं तो मक्का डिफेंस पैक्ट की वास्तविक भूमिका और पाकिस्तान की प्रतिबद्धता को लेकर तस्वीर और साफ हो सकती है.