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सलीम खान की अनकही कहानी, ‘शोले’ और ‘जंजीर’ के बाद भी गुमनाम रहे Salim Khan; फिर फिल्म ‘नाम’ ने दिलाई पहचान

Salim Khan Untold Story: हिंदी सिनेमा की दुनिया में पटकथा लेखक सलीम खान (Salim Khan) की पहचान किसी परिचय की मोहताज नहीं। 'सलीम-जावेद' के नाम से मशहूर इस जोड़ी ने बॉलीवुड को ऐसी फिल्में दीं, जिन्होंने दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी। 'शोले', 'दीवार', 'डॉन', 'जंजीर' और 'दोस्ताना' जैसी फिल्मों की कहानियों ने हिंदी सिनेमा का चेहरा बदल दिया।

सलीम-जावेद की जोड़ी का खत्म होना

लेकिन वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। एक दौर ऐसा आया जब सलीम-जावेद की सुपरहिट जोड़ी अलग हो गई। जावेद अख्तर फिल्मों में सक्रिय रहे, जबकि सलीम खान ने खुद को परिवार और सुकून भरी जिंदगी तक सीमित कर लिया। फिल्मों की हलचल से दूर, वह रोशनी और शोर दोनों से दूर रहे।

पहचान की खोई चमक

कुछ साल बाद एक पार्टी में सलीम खान लोगों से मिल रहे थे। मुस्कुराकर हाथ मिलाते हुए उन्होंने अपना नाम बताया 'मैं सलीम खान।' लेकिन अजीब बात यह थी कि सामने खड़े लोग उन्हें पहचान नहीं पाए। वहीं उनके साथ खड़ीं हेलेन को तुरंत पहचान लिया गया। जब सलीम साहब ने कहा कि उन्होंने 'शोले' जैसी फिल्में लिखी हैं, तो जवाब मिला 'वो तो सलीम-जावेद ने लिखी थी।' तब हेलेन ने धीरे से कहा,'ये वही सलीम-जावेद वाले सलीम हैं।'

सोचिए, जिनकी कहानियों पर देश दीवाना था, उनका चेहरा लोग नहीं पहचानते थे। यह बात सलीम साहब के दिल में गहरे चोट की तरह लगी। सालों की मेहनत, हिट फिल्मों की लिस्ट, और फिर भी नाम 'गुमनाम' यही सवाल उन्हें भीतर से कचोटता रहा।

'नाम'- पहचान की वापसी

अगली सुबह उन्होंने अपने दोस्त और अभिनेता राजेंद्र कुमार को फोन किया और एक नई फिल्म पर चर्चा शुरू की। इस बार सलीम ने फैसला किया कि फिल्म की पटकथा अकेले लिखेंगे।

फिल्म का निर्देशन महेश भट्ट ने किया, और इसमें नजर आए संजय दत्त, कुमार गौरव, नूतन, अमृता सिंह और परेश रावल। गीत लिखे आनंद बख्शी ने और संगीत सजाया लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने।

1986 में रिलीज हुई फिल्म 'नाम' ने दर्शकों के दिलों में छाप छोड़ी। खास बात यह थी कि पोस्टर पर साफ लिखा था पटकथा: सलीम खान। यह सिर्फ फिल्म की सफलता नहीं थी, बल्कि एक लेखक की पहचान की वापसी थी।

असली जीत पहचान में

सक्सेस पार्टी में जब सलीम साहब पहुंचे, तो लोग उनके मिलने के लिए उत्साहित थे। वह 'नया' लेखक बन चुके थे, जिसने अपनी मेहनत और हुनर से नाम वापस पाया। उस दिन शायद सलीम खान ने समझा कि असली जीत सिर्फ तालियों में नहीं, बल्कि तब होती है जब दुनिया आपके नाम को जानती और पहचानती है।

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Deepika Gupta

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