उत्तर प्रदेश

‘डॉक्टर’ कहलाने का हक नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के अस्पतालों को लगाई कड़ी फटकार

Supreme Court Ghaziabad Rape Victim: गाजियाबाद में चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की मौत से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दो निजी अस्पतालों और उनके डॉक्टरों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि किसी भी डॉक्टर का पहला कर्तव्य गंभीर मरीज को तत्काल इलाज देना होता है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। अदालत की सख्त टिप्पणी ने चिकित्सा सेवाओं में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

गरीबी के कारण इलाज में लापरवाही का आरोप

मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अस्पतालों के रवैये पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि बच्ची को गरीब होने की वजह से समय पर इलाज नहीं मिला। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि यही रवैया रहा तो डॉक्टर कहलाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बचता।

'डॉक्टर' शब्द के सम्मान की याद दिलाई

सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों को फटकार लगाते हुए कहा कि यदि वे गंभीर रूप से घायल एक मासूम बच्ची का भी इलाज करने की जिम्मेदारी नहीं निभा सकते, तो उन्हें अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' लिखने पर पुनर्विचार करना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा पेशा केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का माध्यम है।

समय पर इलाज न मिलने से बिगड़ी हालत

सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया कि बच्ची की हालत गंभीर होने के बावजूद उसे समय पर आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। आरोप है कि इलाज में हुई देरी के कारण उसकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई और अंततः उसकी मौत हो गई। इस पूरे घटनाक्रम ने निजी अस्पतालों की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे अहम सवाल

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी केवल इस मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है। अदालत ने संकेत दिया कि आपातकालीन परिस्थितियों में मरीज की आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि उसकी जान बचाना डॉक्टर और अस्पताल की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

गाजियाबाद की चार वर्षीय बच्ची की मौत का मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि चिकित्सा व्यवस्था की जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल उठाता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां यह स्पष्ट करती हैं कि इलाज में लापरवाही और अमानवीय व्यवहार को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत का संदेश साफ है कि चिकित्सा पेशे से जुड़े लोगों के लिए मानवता और कर्तव्य सबसे ऊपर होने चाहिए।

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Lavanya Dayal

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