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तीस्ता पर चीन-बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकी से भारत सतर्क, क्या खतरे में है ‘चिकन नेक’

Teesta Project India Concern: चीन और बांग्लादेश के बीच तीस्ता रिवर प्रोजेक्ट को लेकर बढ़ती बातचीत ने भारत की रणनीतिक चिंताओं को एक बार फिर बढ़ा दिया है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, के करीब चीन की बढ़ती मौजूदगी को लेकर नई दिल्ली लगातार नजर बनाए हुए है। हाल के महीनों में चीन और बांग्लादेश के बीच तीस्ता परियोजना को आगे बढ़ाने पर कई दौर की बातचीत हुई है, जिससे इस मुद्दे को लेकर भू-राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है।

क्या है तीस्ता रिवर प्रोजेक्ट

तीस्ता नदी सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। यह नदी दोनों देशों के लिए कृषि, सिंचाई और जल आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। बांग्लादेश लंबे समय से तीस्ता जल बंटवारे की मांग करता रहा है, लेकिन भारत और बांग्लादेश के बीच अब तक कोई स्थायी समझौता नहीं हो सका है। बांग्लादेश उत्तरी इलाकों में बाढ़ नियंत्रण, नदी प्रबंधन, सिंचाई और जल संरक्षण के लिए बड़े पैमाने पर तीस्ता रिवर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट पर काम करना चाहता है। इस परियोजना में चीन ने निवेश और तकनीकी सहयोग की इच्छा जताई है।

‘चिकन नेक’ क्या है और क्यों है इतना महत्वपूर्ण

सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे आमतौर पर ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, पश्चिम बंगाल में स्थित एक संकरा भूभाग है जो भारत के मुख्य हिस्से को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। यह क्षेत्र कई स्थानों पर केवल 20 से 25 किलोमीटर तक ही चौड़ा है। यही रास्ता असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और सिक्किम को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। सैन्य दृष्टि से भी यह भारत के लिए बेहद संवेदनशील इलाका माना जाता है।

भारत की चिंता क्यों बढ़ रही है

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तीस्ता परियोजना में चीन की बड़ी भूमिका होती है तो भारत की सीमाओं के नजदीक चीन की रणनीतिक मौजूदगी बढ़ सकती है। परियोजना क्षेत्र सिलिगुड़ी कॉरिडोर के अपेक्षाकृत करीब माना जाता है, जिससे नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ी हैं। भारत को आशंका है कि आर्थिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के जरिए चीन क्षेत्र में अपना प्रभाव मजबूत कर सकता है। कई रणनीतिक विशेषज्ञ इसे केवल जल प्रबंधन परियोजना नहीं बल्कि व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की कोशिश के रूप में भी देखते हैं।

बांग्लादेश को चीन की जरूरत क्यों

बांग्लादेश के उत्तरी जिलों में तीस्ता नदी पर निर्भर लाखों किसान लंबे समय से जल संकट का सामना कर रहे हैं। ढाका का कहना है कि नदी प्रबंधन, तट संरक्षण और सिंचाई सुविधाओं को मजबूत करने के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता है। भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से जल बंटवारे पर सहमति नहीं बनने के कारण बांग्लादेश अब वैकल्पिक सहयोग की ओर देख रहा है और चीन इस अवसर का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है।

क्या वास्तव में ‘चिकन नेक’ को खतरा है

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल कोई प्रत्यक्ष सैन्य खतरा नहीं है, लेकिन चीन की बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक मौजूदगी भविष्य में भारत के लिए चुनौती बन सकती है। खासकर ऐसे समय में जब दक्षिण एशिया में चीन लगातार अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है। हालांकि, भारत की सुरक्षा एजेंसियां और रणनीतिक संस्थान इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि किसी भी विदेशी प्रभाव का असर देश के सबसे संवेदनशील भूभागों में से एक सिलिगुड़ी कॉरिडोर के आसपास न पड़े।

भारत के सामने क्या विकल्प हैं

भारत के पास कूटनीतिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर कई विकल्प मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को बांग्लादेश के साथ जल बंटवारे के मुद्दे पर बातचीत तेज करनी चाहिए और आर्थिक व विकास सहयोग को भी मजबूत करना चाहिए। इसके अलावा, पूर्वोत्तर राज्यों की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने, वैकल्पिक परिवहन मार्ग विकसित करने और सीमा क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर भी भारत लगातार काम कर रहा है।

तीस्ता रिवर प्रोजेक्ट केवल जल प्रबंधन का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। चीन और बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकी पर भारत की नजर इसलिए है क्योंकि इसका संबंध सीधे देश की सामरिक सुरक्षा और ‘चिकन नेक’ जैसे संवेदनशील इलाके से जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में यह मुद्दा भारत-बांग्लादेश संबंधों और क्षेत्रीय राजनीति दोनों के लिए अहम साबित हो सकता है।

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Lavanya Dayal

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