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UP News: जैसे-जैसे दीपावली करीब आती जा रही है, बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। हर कोई अपने घर को सजाने में जुटा है कोई रंग-बिरंगी झालर खरीद रहा है, तो कोई नई सजावट की चीजें। लेकिन इसी चमक-दमक के बीच एक ऐसा वर्ग है, जो इस रोशनी के मौसम में भी अंधेरे से जूझ रहा है हमारे कुम्हार भाई-बहन, जो मिट्टी से दिए और बर्तन बनाकर हमारी दिवाली को रोशन करते हैं।
गोरखपुर के कुशीनगर में कुम्हारों ने दीपावली से पहले पूरे जोश के साथ मिट्टी के दिए, कलश, बर्तन और मूर्तियां बनाना शुरू किया है। लेकिन उनके चेहरों पर खुशी की जगह हल्की मायूसी झलक रही है। वजह साफ है बाजारों में चाइनीज झालर और इलेक्ट्रिक लाइटों की बढ़ती मांग, जिसने उनके परंपरागत दीयों की जगह ले ली है।
कुम्हारों का कहना है कि पहले दीपावली के मौके पर हजारों दिए बिक जाया करते थे, लेकिन अब मुश्किल से कुछ सैकड़ों की बिक्री होती है। महंगाई बढ़ने और मिट्टी, रंग, व ईंधन की कीमतें बढ़ जाने से उनकी कमाई भी घट गई है। इसके बावजूद वे अपनी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। एक स्थानीय कुम्हार ने मुस्कुराते हुए कहा, “हम तो हर साल उम्मीद के साथ दिए बनाते हैं, क्योंकि हमें भरोसा है कि लोग एक दिन फिर मिट्टी की सोंधी खुशबू को अपनाएंगे।”
“इस दीपावली पर जब आप अपने घर में दिया जलाएं, तो याद रखिए कि हर मिट्टी के दिए के पीछे किसी मेहनतकश के सपने छिपे हैं। अगर आप एक भी दिया हमसे खरीदते हैं, तो हमारे घरों में भी खुशियों की रौशनी फैल जाएगी।”
चाइनीज लाइटें भले ही चमकदार हों, लेकिन मिट्टी के दिए उस परंपरा, मेहनत और आत्मनिर्भर भारत की पहचान हैं, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ती हैं। तो इस दीपावली पर आइए मिट्टी के दिए जलाएं, कुम्हारों के चेहरों पर मुस्कान लाएं, और अपने देश की कला को नया उजाला दें।
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