Election Commission rejected the allegations of Akhilesh Yadav SP chief had alleged
UP Politics : उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कथित वोट चोरी के आरोपों के बाद यूपी चुनाव आयोग ने अपनी प्रतिक्रिया दी है. समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में चुनावी धांधली का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठाए थे. उन्होंने कहा था कि भाजपा, चुनाव आयोग और कुछ अधिकारियों की साठगाठ के कारण यूपी में वोटिंग प्रक्रिया में गड़बड़ी की जा रही है. अखिलेश यादव ने आरोप लगाया था कि 2022 के विधानसभा चुनाव में साजिशन वोट कटवाए गए हैं और इस संबंध में सपा ने यूपी चुनाव आयोग को 18,000 शपथ पत्र सौंपे थे. हालांकि, अब चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है.
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि सपा द्वारा प्रस्तुत किए गए शपथ पत्रों में से कोई भी मूल रूप से प्राप्त नहीं हुआ है. आयोग ने कहा कि 2022 चुनावों से पहले मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने को लेकर शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जिनमें 33 जिलों के 74 विधानसभा क्षेत्रों से 3,919 हलफनामों की स्कैन कॉपियां शामिल थीं. अब तक, आयोग ने पांच विधानसभा क्षेत्रों की जांच पूरी कर ली है, जबकि 69 विधानसभा क्षेत्रों की जांच जारी है. आयोग ने इस संबंध में आश्वासन दिया है कि जांच पूरी होने पर क्षेत्रवार रिपोर्ट जारी की जाएगी.
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चुनाव आयोग ने यह भी बताया कि जिन पांच विधानसभा क्षेत्रों की जांच की गई है, उनमें यह पाया गया कि जिन व्यक्तियों के नाम पर नवंबर 2022 में शपथ पत्र बने थे, उनकी मृत्यु 2022 से कई साल पहले हो चुकी थी. इन व्यक्तियों ने अपने नाम पर बने शपथ पत्र की स्कैन कॉपी को दिखाने से इनकार किया और ऐसा कोई शपथ पत्र देने की बात भी पूरी तरह से नकार दी.
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा दिए गए इस बयान में सच्चाई नहीं है. उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि भा.ज.पा.-चुनाव आयोग-अधिकारी की घपला तिकड़ी मिलकर वोट-डकैती कर रही है. ये वही तीन तिगाड़ा है, जिन्होंने देश के वर्तमान और भविष्य को बिगाड़ा है. सपा प्रमुख ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग को शपथ पत्रों की प्राप्ति के प्रमाण स्वरूप दिए गए पावती पत्रों की जांच करनी चाहिए. उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की कि वह यह स्पष्ट करें कि क्या डिजिटल रसीद सही है, क्योंकि अगर ऐसा नहीं है, तो ना सिर्फ चुनाव आयोग बल्कि ‘डिजिटल इंडिया’ भी संदेह के घेरे में आ जाएगा.
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