Yamuna Flood
Yamuna Flood : यमुना नदी में आई बाढ़ ने राजधानी दिल्ली के हजारों लोगों की जिंदगी को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। हालांकि पानी का स्तर अब धीरे-धीरे नीचे जा रहा है, लेकिन बाढ़ प्रभावित इलाकों में रह रहे लोगों की परेशानियां और भी बढ़ गई हैं। राहत शिविरों में हजारों लोग गुजारा कर रहे हैं, जहां न तो पर्याप्त खाने-पीने की व्यवस्था है और न ही साफ-सफाई की।
ITO ब्रिज के पास बने अस्थायी राहत शिविर में करीब 1100 लोग ठहरे हुए हैं। इनमें ज्यादातर मजदूर परिवार हैं, जो यमुना किनारे (Yamuna Flood) खेती करके अपना जीवन चलाते थे। बाढ़ में फसलें उजड़ जाने के कारण उनकी रोज़ी-रोटी पर भी संकट खड़ा हो गया है। कैंप में रहने वाले लोगों ने बताया कि रात के समय बिजली कटने पर उन्हें डर का माहौल झेलना पड़ता है। महिलाओं के लिए शौचालय और स्नान की सुविधा बेहद कम है, जिससे उन्हें भारी दिक्कत हो रही है।
यमुना बाजार 32 घाट कॉलोनी और तिब्बती कॉलोनी जैसे निचले इलाकों में रहने वाले सैकड़ों परिवार बाढ़ का पानी घरों में भर जाने के कारण राहत शिविरों में जा बसे हैं। ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले कई लोग रिश्तेदारों के यहां शरण लेने को मजबूर हैं। लोगों ने बताया कि राहत शिविरों में भी कभी-कभी पानी घुस जाता है, जिस कारण उन्हें दूसरी जगहों पर शिफ्ट होना पड़ता है। घाट क्षेत्र के लगभग 400 लोग अपना सबकुछ छोड़कर मोरी गेट के शिविर में रह रहे हैं।
सेंट्रल वॉटर कमिशन के अधिकारियों के मुताबिक, शुक्रवार को यमुना का जलस्तर हर घंटे एक से दो सेंटीमीटर घटा। दोपहर 12 बजे यह 207.24 मीटर था, जबकि शाम 6 बजे तक यह घटकर 207.12 मीटर रह गया। हथिनी कुंड बैराज से छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा भी अब काफी कम हो चुकी है। शुक्रवार को दोपहर 12 बजे एक बार 1,02,997 क्यूसेक पानी छोड़ा गया, लेकिन इसके बाद हर घंटे औसतन 50-52 हजार क्यूसेक पानी ही छोड़ा गया। वहीं, ओखला बैराज से लगातार 2.44 लाख क्यूसेक पानी डिस्चार्ज किया जा रहा है, जिससे जलस्तर में और तेजी से कमी आने की संभावना है।
मदनपुर खादर इलाके में रहने वाले लोग बताते हैं कि अचानक बढ़े पानी ने उनका सब सामान बहा दिया। एक मजदूर ने कहा, “आटा-चावल सब पानी में चला गया। अब खाने तक को तरसना पड़ रहा है। तिरपाल डालकर जैसे-तैसे रात गुजार रहे हैं।” वहीं, एक बुजुर्ग व्यक्ति ने दुख जताते हुए कहा कि सब्जियां भी पानी में डूब गई और अब कुछ भी बचा नहीं है।
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बदायूं (उत्तर प्रदेश) से आए मजदूर परिवारों का कहना है कि सरकारी मदद अभी तक नहीं मिली। एक NGO द्वारा चलाए जा रहे स्कूल में बच्चों के लिए आने वाले खाने को ही वे आपस में बांटकर खा रहे हैं।
लोगों का कहना है कि वे नहीं जानते कि हालात कब तक सुधरेंगे। फिलहाल उनके पास राहत शिविरों में ही रहने का विकल्प है। हालांकि जलस्तर में गिरावट राहत की खबर है, लेकिन घर उजड़ जाने और रोज़गार खत्म होने के कारण प्रभावित परिवारों के सामने भविष्य की चिंता और भी बड़ी हो गई है।
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