बिहार

सियासी भूचाल में उतरे लालू: संकट में घिरे तेजस्वी की ‘ढाल’ बने, क्या पार्टी और परिवार को संभाल पाएंगे?

Bihar News: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने RJD के भीतर सियासी भूचाल ला दिया है। करारी हार के बाद पार्टी में उथल-पुथल बढ़ गई है और परिवार में भी मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। ऐसे समय में RJD सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव खुद सक्रिय हो गए हैं और अपने बेटे तेजस्वी यादव के लिए मजबूत सियासी ढाल बनकर सामने आए हैं। बड़ा सवाल यह है, क्या लालू यादव पार्टी और परिवार दोनों को फिर से एकजुट कर पाएंगे?

RJD के इतिहास की दूसरी सबसे खराब हार

हार से टूटे तेजस्वी की मुश्किलें और बढ़ गईं, जब उनकी बहन रोहिणी आचार्य ने खुलकर उन पर और उनके सलाहकारों पर सवाल उठाए। तेज प्रताप पहले से ही परिवार और पार्टी, दोनों से दूरी बनाए हुए हैं। ऐसे में तेजस्वी के सामने दोहरी चुनौती है, पार्टी को संभालना और परिवार को टूटने से बचाना। RJD के इतिहास की दूसरी सबसे खराब हार के बाद सोमवार को विधायक दल की बैठक बुलाई गई। बैठक में लालू यादव, राबड़ी देवी और मीसा भारती भी मौजूद रहीं। सभी विधायकों के सामने तेजस्वी यादव भावुक हो गए और खुद को विधायक दल के नेता पद से हटाने का ऑफर तक दे दिया। उन्होंने कहा“अगर चाहें तो मेरी जगह किसी और को नेता चुन सकते हैं।”

लालू प्रसाद यादव ने तेजस्वी का दिया पूरा साथ

तेजस्वी की इस भावनात्मक पेशकश ने बैठक का माहौल बदल दिया। तभी लालू प्रसाद यादव ने हस्तक्षेप करते हुए साफ कहा कि विधानसभा में पार्टी का नेतृत्व तेजस्वी ही करेंगे। उन्होंने विधायकों को भरोसा दिलाया कि तेजस्वी को पूरा समर्थन मिलेगा और परिवार के भीतर की खींचतान वे खुद सुलझा लेंगे। लालू के इस बयान के बाद विधायकों ने सर्वसम्मति से तेजस्वी को ही अपना नेता चुना। यही नहीं, इस फैसले ने यह सियासी संदेश भी दे दिया कि लालू के बाद पार्टी की कमान तेजस्वी के हाथ में ही रहेगी।

पार्टी के भीतर ही तेजस्वी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल

चुनाव में हार के बाद तेजस्वी के सामने चुनौती कम नहीं है। विपक्ष में रहते हुए पार्टी को एकजुट रखना, कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना और विधायकों को टूटने से बचाना उनके लिए बड़ी परीक्षा होगी। खासकर तब, जब पार्टी के भीतर ही तेजस्वी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं। इधर परिवार में भी हालात तनावपूर्ण हैं। रोहिणी आचार्य भाई से नाराज़ होकर दूरी बना चुकी हैं, जबकि तेज प्रताप खुद को लालू का असली वारिस बताने की कोशिशों में लगे हुए हैं। ऐसे में लालू को परिवार का विवाद संभालने की जिम्मेदारी खुद उठानी पड़ी है।

अब पूरा दारोमदार तेजस्वी यादव पर है कि वे लालू की छत्रछाया में पार्टी को कैसे दोबारा खड़ा करते हैं। सियासी राह मुश्किल जरूर है, लेकिन लालू का साथ यानी अभी भी उम्मीद बाकी।

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Shagun Chaurasia

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