विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने गुरुवार को फिनलैंड में आयोजित ‘कुल्तारांता टॉक्स’ (Kultaranta Talks) के दौरान अमेरिका के उस रवैये की आलोचना की, जिसे उन्होंने भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर असंगत और सुविधानुसार बदलने वाला बताया। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था जब वॉशिंगटन ने खुद नई दिल्ली को वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए रूसी कच्चा तेल खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया था, लेकिन बाद में उसी मुद्दे पर भारत पर टैरिफ लगा दिए गए।
‘Emerging Powers and the New Geopolitical Competition’ सत्र में बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि इस मामले में किसी बड़े सिद्धांत की बात नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका जब उसके हित में होता है तब एक रुख अपनाता है और जब परिस्थितियां बदलती हैं तो उसका रुख भी बदल जाता है। उनकी यह टिप्पणी उस सवाल के जवाब में आई, जिसमें एक पत्रकार ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा था कि भारत रूस के प्रति जरूरत से ज्यादा सहानुभूति रखता है और रूसी तेल खरीदने के लिए अत्यधिक इच्छुक रहा है।
भारत के ऊर्जा संबंधी फैसलों का बचाव करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि नई दिल्ली हमेशा अपनी राष्ट्रीय आवश्यकताओं और हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेती है। उन्होंने कहा कि भारत तेल की खरीद कीमत और उपलब्धता के आधार पर करता है। जयशंकर के अनुसार, उस समय वैश्विक बाजार में उपलब्ध अधिकांश तेल रूस से आ रहा था क्योंकि यूरोपीय देश मध्य पूर्व से तेल खरीद रहे थे, जो पारंपरिक रूप से भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। ऐसे हालात ने भारत को रूसी तेल की ओर रुख करने के लिए प्रेरित किया।
जयशंकर ने याद दिलाया कि वर्ष 2022 में अमेरिका ने स्वयं माना था कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों द्वारा मॉस्को पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता और महंगाई बढ़ने का खतरा था। ऐसी स्थिति में अमेरिका ने सीधे भारत से रूसी तेल खरीदने का आग्रह किया था ताकि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार स्थिर रह सके और वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति में तेज वृद्धि को रोका जा सके। उन्होंने दोहराया कि भारत तेल की खरीद केवल लागत और उपलब्धता के आधार पर करता है।
विदेश मंत्री ने पश्चिमी देशों की प्रतिबंध नीतियों में मौजूद विरोधाभासों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा जैसे जटिल मुद्दों को चुनिंदा नैतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।
जयशंकर ने यूरोप की ऐतिहासिक और नैतिक असंगतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी यूरोपीय देश पर कभी भारतीय हथियारों से हमला नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि काश वह यही बात यूरोपीय हथियारों के बारे में भारत के संदर्भ में भी कह पाते।
जब उनसे इस बयान को स्पष्ट करने के लिए कहा गया तो जयशंकर ने कहा कि भारत लंबे समय से इस बात को लेकर चिंतित रहा है कि यूरोप से बेचे गए हथियारों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया गया है। उन्होंने कहा कि यह केवल वर्तमान की बात नहीं है, बल्कि कई वर्षों से ऐसा होता आया है। भारत ने कभी भी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे यूरोप की सुरक्षा को खतरा पैदा हुआ हो। ऐसे में भारत की यह चिंता पूरी तरह उचित है।
यूरोप में अपनी विभिन्न बैठकों और कार्यक्रमों के दौरान एस. जयशंकर लगातार पश्चिमी देशों के कथित दोहरे मानदंडों पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा नीति और रणनीतिक स्वायत्तता के मुद्दों पर भारत अपने राष्ट्रीय हितों और स्वतंत्र विदेश नीति के आधार पर फैसले लेने का अधिकार रखता है, और नई दिल्ली इन्हीं सिद्धांतों के तहत अपनी स्थिति स्पष्ट करती रही है।
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