Women Reservation Bill: लोकसभा में प्रस्तावित महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने के लिए केंद्र सरकार ने राजनीतिक स्तर पर अपनी रणनीति तेज कर दी है। संसदीय गणित को अपने पक्ष में सुनिश्चित करने के लिए सरकार एक ओर सहयोगी दलों का समर्थन मजबूत कर रही है, वहीं दूसरी ओर कई विपक्षी दलों के साथ भी लगातार बैक-चैनल संवाद जारी है। सूत्रों का कहना है कि सरकार की कोशिश है कि विधेयक को व्यापक राजनीतिक सहमति के साथ पारित कराया जाए ताकि इसे लेकर किसी तरह का संवैधानिक या राजनीतिक विवाद न रहे।
संसद के मौजूदा संख्याबल के अनुसार, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास 299 सांसदों का समर्थन माना जा रहा है। हाल ही में शिवसेना में शामिल हुए छह सांसदों को जोड़ने के बाद यह संख्या और मजबूत हुई है। इसके अलावा अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के 20 सांसदों तथा वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) के 4 सांसदों के समर्थन के साथ सरकार का संभावित समर्थन 323 सांसदों तक पहुंचता है। हालांकि, यदि विधेयक पर मतदान लोकसभा की पूर्ण सदस्य संख्या (543) के आधार पर होता है, तो संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत के रूप में 360 मतों की आवश्यकता होगी। ऐसे में सरकार को अभी भी अतिरिक्त समर्थन की जरूरत है।
राजनीतिक हलकों में सबसे अधिक चर्चा द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के रुख को लेकर है। लोकसभा में पार्टी के 22 सांसद हैं। यदि डीएमके विधेयक का समर्थन करती है तो सरकार के लिए आवश्यक बहुमत जुटाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। वहीं यदि पार्टी मतदान से अनुपस्थित रहती है, तो सदन की प्रभावी सदस्य संख्या घट सकती है, जिससे दो-तिहाई बहुमत का आवश्यक आंकड़ा भी कम हो जाएगा।
शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (एसपी) के 8 सांसदों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह दल सरकार के पक्ष में मतदान करता है तो विधेयक की राह और आसान हो सकती है। दूसरी ओर, यदि पार्टी मतदान में हिस्सा नहीं लेती, तब भी सरकार को संसदीय गणित में लाभ मिल सकता है क्योंकि प्रभावी मतदान संख्या कम हो जाएगी।
सूत्रों के अनुसार, सरकार विभिन्न विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए है। संसदीय कार्य मंत्रालय और शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व स्तर पर अनौपचारिक संवाद के जरिए समर्थन जुटाने की कोशिश की जा रही है। सरकार का उद्देश्य केवल आवश्यक संख्या जुटाना नहीं, बल्कि महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक विषय पर अधिकतम राजनीतिक सहमति बनाना भी है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि महिला आरक्षण के मुद्दे पर अधिकांश दल सार्वजनिक रूप से समर्थन की बात करते रहे हैं, लेकिन अंतिम रणनीति मतदान के समय ही स्पष्ट होगी। ऐसे में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि कौन-सा दल पक्ष में मतदान करता है, कौन विरोध करता है और कौन मतदान से दूरी बनाता है।
फिलहाल सरकार की पूरी कोशिश है कि विधेयक को पर्याप्त समर्थन के साथ पारित कराकर इसे व्यापक राजनीतिक सहमति का उदाहरण बनाया जाए। आने वाले दिनों में विभिन्न दलों की आधिकारिक घोषणा और संसदीय रणनीति इस विधेयक की दिशा तय करेगी।
रिपोर्ट/पंकज वानखेड़े
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