Asaduddin Owaisi Political Representation: AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भारत में अल्पसंख्यकों के हितों और मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों पर सवाल उठाए हैं। उनसे पूछा गया था कि क्या भारत अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठा रहा है। इसके जवाब में ओवैसी ने कहा कि देश के संस्थापकों ने ऐसी संवैधानिक व्यवस्था की कल्पना की थी, जिसमें राज्य का कोई धर्म नहीं होगा और सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे। ओवैसी ने आरोप लगाया कि देश पर शासन करने वाली अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों ने मुसलमानों को राजनीतिक रूप से हाशिए पर रखा और उन्हें बराबरी की राजनीतिक भागीदारी नहीं मिल सकी।
ओवैसी ने कहा कि मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक रूप से हाशिए पर होने के लिए किसी एक सरकार या पार्टी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उनके मुताबिक, एक के बाद एक आई सरकारें मुसलमानों को ठोस राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाने में नाकाम रही हैं। उन्होंने कहा कि नेहरू से लेकर मोदी तक मुसलमानों को मुख्य रूप से वोटर के तौर पर देखा गया, लेकिन उन्हें राजनीतिक रूप से बराबरी का हिस्सेदार नहीं बनाया गया। ओवैसी ने संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का आंकड़ा सामने रखते हुए भी सवाल उठाए और कहा कि करीब 18 करोड़ की आबादी वाले समुदाय का संसद में प्रतिनिधित्व 4 प्रतिशत है।
AIMIM प्रमुख ने कहा कि सवाल केवल मुस्लिम सांसदों की संख्या का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या मुसलमानों को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज और ताकत तैयार करने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि कई अन्य सामाजिक समूह राजनीतिक नेतृत्व और प्रतिनिधित्व के संस्थान बनाने में सफल रहे हैं, लेकिन मुसलमानों को ऐसा अवसर नहीं दिया गया। ओवैसी ने ब्राह्मण, ठाकुर, नायर और दलित समुदायों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन समुदायों के पास राजनीतिक ताकत है, जबकि मुसलमानों को इससे दूर रखा गया।
कोच्चि में ओवैसी ने कहा कि मुसलमानों से मुख्य रूप से वोट देने वाले समूह के रूप में चुनाव में हिस्सा लेने की उम्मीद की जाती रही है। उन्होंने कहा कि चुनाव के समय उनसे वोट मांगा जाता है, लेकिन राजनीतिक फैसलों में उनकी स्वतंत्र भूमिका और प्रतिनिधित्व के सवाल पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। उन्होंने बुलडोजर कार्रवाई, मस्जिद के मुद्दे और एनकाउंटर जैसे मुद्दों का जिक्र करते हुए कहा कि इन परिस्थितियों के बावजूद चुनाव के समय मुसलमान उन्हीं राजनीतिक दलों को वोट देते हैं, जिन्होंने उनके मुताबिक उन्हें राजनीतिक रूप से हाशिए पर रखा।
ओवैसी ने BJP के साथ खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली पार्टियों पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि ये पार्टियां चुनाव के दौरान मुस्लिम समुदाय से वोट मांगती हैं, लेकिन उसे राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने में नाकाम रही हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी पार्टियों ने मुसलमानों को केवल वोटर तक सीमित रखा और स्वतंत्र मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व को पर्याप्त जगह नहीं दी। ओवैसी ने सवाल उठाया कि अगर BJP पर्याप्त मुस्लिम प्रतिनिधित्व नहीं देती और दूसरी पार्टियां स्वतंत्र मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व को जगह नहीं देतीं, तो समुदाय के सामने राजनीतिक विकल्प क्या रह जाता है।
जब ओवैसी से पूछा गया कि क्या मुसलमान पारंपरिक रूप से कांग्रेस को वोट देते रहे हैं, तो उन्होंने इसे पार्टी के प्रति बिना शर्त राजनीतिक समर्थन मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि मुसलमानों ने दो विकल्पों में कम बुरी पार्टी को चुना, क्योंकि उनके पास दूसरा व्यावहारिक विकल्प नहीं था। ओवैसी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह मुस्लिम समुदाय का चुनावी समर्थन चाहती है, लेकिन स्वतंत्र मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के उभरने का विरोध करती है। उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता केवल चुनावी नारा नहीं हो सकती और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए अलग-अलग समुदायों की अपनी आवाज होना जरूरी है।
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