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Basant Panchami 2026: हिंदू पर्व, सूफी परंपरा और पीला रंग… निजामुद्दीन दरगाह की अनोखी बसंत कहानी

Basant Panchami 2026: बसंत पंचमी भारत में ऋतु परिवर्तन और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से मां सरस्वती को समर्पित होता है और इस दिन पीले रंग का विशेष महत्व होता है। पीला रंग बसंत ऋतु, फसलों की हरियाली और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। हिंदू परंपरा में जहां इस दिन पीले वस्त्र पहनकर पूजा की जाती है, वहीं दिल्ली स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर भी बसंत पंचमी के अवसर पर पीले रंग की चादर चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है। यह परंपरा धार्मिक सौहार्द और सांस्कृतिक एकता की मिसाल मानी जाती है।

निजामुद्दीन औलिया और बसंत पंचमी की ऐतिहासिक परंपरा

निजामुद्दीन औलिया दरगाह में बसंत पंचमी मनाने की परंपरा कई सौ साल पुरानी बताई जाती है। मान्यता है कि प्रसिद्ध सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया के प्रिय शिष्य अमीर खुसरो ने पहली बार बसंत पंचमी पर पीले फूलों और पीले वस्त्रों के साथ दरगाह में बसंत का जश्न मनाया था। कहा जाता है कि इस परंपरा से संत इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने इसे हर साल मनाने की अनुमति दे दी। तभी से बसंत पंचमी के दिन दरगाह में पीले रंग की चादर और फूल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है।

पीली चादर चढ़ाने के पीछे छिपा आध्यात्मिक संदेश

दरगाह पर चढ़ाई जाने वाली पीली चादर केवल एक रस्म नहीं, बल्कि इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी है। पीला रंग सूफी परंपरा में खुशी, उम्मीद और जीवन के उत्सव का प्रतीक माना जाता है। बसंत पंचमी के दिन दरगाह में कव्वालियां गाई जाती हैं और माहौल में विशेष रौनक देखने को मिलती है। इस अवसर पर हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालु एक साथ दरगाह पहुंचते हैं, जो भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाता है। यह परंपरा बताती है कि आस्था और संस्कृति सीमाओं में बंधी नहीं होती।

आज के समय में बसंत पंचमी और निजामुद्दीन दरगाह का महत्व

आज भी बसंत पंचमी के दिन निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है। लोग पीली चादर, फूल और मिठाइयां चढ़ाकर अमन, सुख और समृद्धि की दुआ मांगते हैं। यह परंपरा भारत की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक एकता को मजबूत करती है। बसंत पंचमी 2026 के अवसर पर भी यह आयोजन श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। कुल मिलाकर, निजामुद्दीन दरगाह में पीली चादर चढ़ाने की परंपरा भारत की साझा संस्कृति और आपसी सम्मान की एक खूबसूरत मिसाल है।

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