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“मुझे किसी अंतरराष्ट्रीय कानून की ज़रूरत नहीं…” ट्रंप के 1 साल ने कैसे हिला दी दुनिया? अवज्ञा, अमेरिका की नई दादागीरी की पूरी कहानी

Trump One Year In Power: दुनिया जिस वैश्विक व्यवस्था को दशकों से “नियम आधारित विश्व व्यवस्था” मानती रही, वह पिछले एक साल में बुरी तरह डगमगा गई। इसकी वजह बने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने सत्ता संभालते ही यह साफ कर दिया कि उनके लिए अंतरराष्ट्रीय कानून, संस्थाएं और परंपराएं सिर्फ कागज़ी बातें हैं।

‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे के साथ ट्रंप ने वैश्विक कूटनीति में ऐसा तूफान खड़ा किया, जिसने सहयोग को टकराव में और नियमों को ताकत के प्रदर्शन में बदल दिया। यह रिपोर्ट ट्रंप के उस एक साल को समझाने की कोशिश है, जिसमें अमेरिका ने दुनिया के सरपंच की तरह व्यवहार किया कभी धमकी देकर, कभी हमला करके और कभी संस्थाओं को ही तोड़कर।

“मेरी ताकत की सीमा सिर्फ मेरी नैतिकता है”

8 जनवरी 2026 को न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में ट्रंप का बयान दुनिया के लिए झटका था। उन्होंने कहा, “मुझे किसी अंतरराष्ट्रीय कानून की ज़रूरत नहीं, मेरी शक्ति की सीमा सिर्फ मेरी नैतिकता है।” यह बयान साफ करता है कि ट्रंप प्रशासन वैश्विक नियमों से खुद को ऊपर मानता है। 20 जनवरी 2025 को सत्ता में लौटने के बाद से ट्रंप ने अमेरिकी विदेश नीति को पूरी तरह अपनी मर्जी से चलाया बिना संयुक्त राष्ट्र और कई बार बिना अपने सहयोगियों से पूछे।

बेडरूम से उठवा लिया राष्ट्रपति

जनवरी 2026 में ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने आधी रात को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को उनके बेडरूम से उठा लिया। उन्होंने इसे “नार्को-टेररिज्म के खिलाफ कार्रवाई” बताया, लेकिन न तो यूएन की अनुमति ली गई, न ही अमेरिकी कांग्रेस को भरोसे में लिया गया।
इसके बाद ट्रंप ने घोषणा कर दी कि अमेरिका अब वेनेजुएला का प्रशासन चलाएगा जब तक “सुरक्षित ट्रांज़िशन” नहीं हो जाता। यह खुला साम्राज्यवादी ऐलान था।

दोस्त भी दुश्मन

ट्रंप का दूसरा बड़ा हथियार रहा टैरिफ। भारत, चीन, कनाडा, मैक्सिको समेत कई देशों पर उन्होंने भारी टैक्स लगाया। अप्रैल 2025 में सभी देशों पर 10% टैरिफ थोप दिया गया WTO नियमों की खुली अवहेलना करते हुए। ट्रंप का तर्क था “जो हमें चार्ज करेगा, हम भी उतना ही करेंगे।” लेकिन इस फैसले ने वैश्विक व्यापार को हिला दिया और आज अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में भी इसकी वैधता पर सुनवाई चल रही है।

गाजा में शांति या मुनाफा?

ट्रंप ने गाजा शांति योजना को भी ‘डील’ बना दिया। उन्होंने ‘Board of Peace’ बनाया, खुद चेयरमैन बने और उसमें शामिल होने के लिए देशों से 1 अरब डॉलर की फीस मांगनी शुरू कर दी। भारत को भी ऑफर मिला। ट्रंप का प्लान गाजा को ‘मॉडर्न मिरेकल सिटी’ बनाने का है जहां अमेरिकी कंपनियों को ठेके मिलेंगे। यानी शांति भी अमेरिका फर्स्ट के हिसाब से।

ईरान पर हमला

2025 में अमेरिका ने ईरान पर हमला किया बिना किसी प्रत्यक्ष उकसावे और बिना UN सुरक्षा परिषद की अनुमति के। यह हमला अंतरराष्ट्रीय कानून के सीधे उल्लंघन के रूप में देखा गया, लेकिन दुनिया सिर्फ बयानबाजी कर सकी। अमेरिका ने इसे “आने वाले खतरे” का बहाना बताया, लेकिन कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया।

G-20 से दक्षिण अफ्रीका बाहर

नवंबर 2025 में ट्रंप ने G-20 से दक्षिण अफ्रीका को बाहर कर दिया। कारण बताया गया गोरे किसानों पर हमले। इसके बाद अमेरिका ने दक्षिण अफ्रीका की फंडिंग और सब्सिडी भी रोक दी। ट्रंप का साफ संदेश था की “जहां अमेरिका नहीं, वहां कोई और भी नहीं।”

वैश्विक स्वास्थ्य पर वार

ट्रंप ने WHO को “चीन के इशारों पर चलने वाला संगठन” बताते हुए अमेरिका को इससे बाहर कर लिया। इससे WHO की फंडिंग पर भारी असर पड़ा और वैश्विक स्वास्थ्य कार्यक्रम कमजोर हो गए। अब अमेरिका जेनेटिक्स, महामारी और क्लोनिंग जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बाहर हो चुका है।

66 वैश्विक संस्थाओं से अमेरिका की विदाई

जनवरी 2026 में ट्रंप ने एक झटके में अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकाल दिया। इनमें पेरिस जलवायु समझौता, IPCC, UNFCCC और इंटरनेशनल सोलर अलायंस भी शामिल हैं। ट्रंप ने कहा कि ये संस्थाएं अमेरिकी संप्रभुता के लिए खतरा हैं और टैक्सपेयर्स का पैसा बर्बाद करती हैं।

अब ग्रीनलैंड पर नजर

अब ट्रंप की नजर ग्रीनलैंड पर है। उनका तर्क अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड नहीं लिया, तो चीन या रूस ले लेंगे। यह विस्तारवादी सोच अब खुलकर सामने आ चुकी है।

नियम नहीं, सिर्फ ताकत

ट्रंप का एक साल का कार्यकाल बताता है कि अमेरिका अब नियमों से नहीं, ताकत से दुनिया चलाना चाहता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं कमजोर हुईं, कानून बेअसर दिखे और वैश्विक सहयोग टूटता नजर आया। आलोचक इसे “नियम आधारित विश्व व्यवस्था का अंत” कह रहे हैं जहां कानून नहीं, बल्कि ताकत ही आखिरी सच बनती जा रही है।

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