Rajkot: गुजरात के राजकोट में नगर निगम के मेगा डिमोलिशन अभियान के बाद अब खर्च को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। जंगलेश्वर इलाके में अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई के दौरान अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के लिए चाय-नाश्ते व भोजन पर 27.20 लाख रुपये खर्च होने का बिल सामने आने के बाद नगर निगम में हड़कंप मच गया है। स्टैंडिंग कमेटी ने फिलहाल इस बिल के भुगतान पर रोक लगाते हुए अधिकारियों से लिखित स्पष्टीकरण मांगा है।
यह अभियान फरवरी में राजकोट के पूर्वी जोन के वार्ड नंबर-16 स्थित जंगलेश्वर इलाके में चलाया गया था। आजी नदी के किनारे और टीपी रोड पर अतिक्रमण हटाने के लिए नगर निगम ने करीब 1,400 अवैध निर्माणों को ध्वस्त किया था। इस कार्रवाई में नगर निगम, पुलिस और अन्य सरकारी विभागों के 4,800 से अधिक अधिकारी और कर्मचारी तैनात थे।
नगर निगम के रिकॉर्ड के मुताबिक अभियान के दौरान कर्मचारियों के लिए चाय, कॉफी, नाश्ता और भोजन की व्यवस्था की गई थी। इसमें 21,310 कप चाय-बिस्कुट, 50 प्लेट गांठिया-जलेबी, पोहा, 360 प्लेट नाश्ता और लंच पर 6,30,946 रुपये खर्च हुए।
इसके अलावा 21 से 27 फरवरी के बीच 13,390 स्पेशल लंच पैकेट, मसाला छाछ और 4,000 नींबू-अदरक शरबत की बोतलें मंगाई गईं, जिन पर 20,68,500 रुपये खर्च किए गए। इस तरह भोजन और नाश्ते का कुल बिल 27,20,946 रुपये पहुंच गया।
भोजन के अलावा मिनरल वॉटर पर 12,40,028 रुपये और मंडप सर्विस पर 6,70,678 रुपये खर्च होने का दावा भी सामने आया है। इन सभी खर्चों को मिलाकर अभियान की कुल लागत करीब 46.31 लाख रुपये बताई जा रही है।
जब यह प्रस्ताव मंजूरी के लिए स्टैंडिंग कमेटी के सामने रखा गया तो सदस्यों ने इतने बड़े खर्च पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि तोड़फोड़ अभियान के दौरान चाय-नाश्ते और भोजन पर इतनी बड़ी राशि कैसे खर्च हो सकती है। इसी कारण बिल पर फिलहाल रोक लगा दी गई है और संबंधित अधिकारियों से विस्तृत जवाब मांगा गया है।
कांग्रेस ने पूरे मामले को भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए नगर निगम पर गंभीर आरोप लगाए हैं। राजकोट जिला कांग्रेस अध्यक्ष राजदीपसिंह जाडेजा ने कहा कि एक ओर गरीबों के घर तोड़े जा रहे थे, वहीं दूसरी ओर अधिकारी जनता के टैक्स के पैसे से जलेबी-गांठिया और अन्य व्यंजनों का आनंद ले रहे थे। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की।
मिनरल वॉटर के खर्च पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि 200 एमएल की एक बोतल की औसत कीमत 5 रुपये मानी जाए, तो 12.40 लाख रुपये में करीब 2.40 लाख बोतलें खरीदी जा सकती थीं। इसे लेकर विपक्ष और स्थानीय लोगों ने खर्च की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं।
नगर निगम अधिकारियों का कहना है कि अभियान के दौरान हजारों कर्मचारी कई दिनों तक लगातार ड्यूटी पर तैनात थे। ऐसे में भोजन, चाय-नाश्ता और पेयजल की व्यवस्था प्रशासनिक जरूरत थी ताकि किसी कर्मचारी को कार्यस्थल छोड़कर बाहर न जाना पड़े। अधिकारियों के अनुसार, अब पूरे खर्च की जांच और स्पष्टीकरण के बाद ही बिल को मंजूरी देने पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।
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