Sambhal Violence NSA Detention: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज की उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई हिरासत रद्द कर दी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि पुलिस हिरासत में कथित तौर पर दिए गए कबूलनामे को NSA के तहत किसी व्यक्ति की निवारक हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने अवैध हिरासत आदेश जारी करने पर यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
मस्जिद सर्वे के दौरान हुई थी हिंसा
मुल्ला अफरोज पर नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा की साजिश में मुख्य भूमिका निभाने का आरोप है। इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद उसे अक्टूबर 2025 में NSA के तहत दोबारा गिरफ्तार किया गया था। 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ NSA के तहत हिरासत आदेश जारी हुआ था।
सरकार ने दलील दी कि अफरोज की रिहाई से दोबारा हिंसा और कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि पुलिस हिरासत में दिया गया ऐसा बयान, जो अदालत में कानूनी तौर पर स्वीकार्य नहीं है, NSA हिरासत का आधार कैसे बन सकता है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह आदेश भी रद्द कर दिया, जिसने हिरासत को बरकरार रखा था।
NSA क्या है?
NSA केंद्र और राज्य सरकारों को राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा माने जाने वाले व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखने की अनुमति देता है। हिरासत अधिकतम 12 महीने तक हो सकती है और आदेश को हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला सलाहकार बोर्ड मंजूरी देता है।
फैसले में दिवंगत लॉ क्लर्क को श्रद्धांजलि
फैसला सुनाते समय जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपने लॉ क्लर्क ऋत्विक देशवाल को श्रद्धांजलि दी, जिनका 27वां जन्मदिन आने से पहले निधन हो गया था। उन्होंने फैसला उन्हें समर्पित किया। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह पहली बार बताया गया कि किसी दिवंगत लॉ क्लर्क को इस तरह फैसला समर्पित किया गया। जस्टिस दत्ता ने कहा कि ऋत्विक ने फैसले की रिसर्च में महत्वपूर्ण योगदान दिया था और उनकी अंतिम मेहनत की छाप इसमें स्पष्ट है। उन्होंने उनके निधन को अपने जीवन में “असहनीय रूप से गहरा खालीपन” बताया।

