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1.5 डिग्री की सीमा के करीब दुनिया, UNEP ने चेताया- कुछ जलवायु नुकसान कभी नहीं होंगे ठीक

by | Sep 5, 2026 | दुनिया

1.5 Degree Global Warming: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट ‘Limiting Overshoot’ ने चेतावनी दी है कि दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की 1.5 डिग्री सेल्सियस सीमा के बेहद करीब पहुंच गई है। अगले कुछ वर्षों में तापमान अस्थायी रूप से इस स्तर को पार कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि 50 साल की तकनीकी प्रगति भी जलवायु परिवर्तन को पूरी तरह पलट नहीं सकती और संभव है कि “हालात फिर सामान्य न हों।”

रिपोर्ट के मुताबिक, 1.5°C पार होने से चरम मौसम बढ़ सकता है, पारिस्थितिक तंत्र तेजी से नष्ट हो सकते हैं और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों के डूबने का खतरा बढ़ सकता है। UNEP ने तत्काल और लगातार ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के साथ सरकारों और निवेशकों से स्थायी बदलावों के लिए लंबी अवधि की तैयारी करने को कहा है।

दक्षिण एशिया पर कई मोर्चों का दबाव

UNEP इंडिया के प्रमुख बालकृष्ण पिसुपति ने कहा कि कुछ जलवायु प्रभाव वापस सुधारे जा सकते हैं, लेकिन कई स्थायी होते हैं। दक्षिण एशिया पर जनसंख्या दबाव, आय असमानता, तकनीक तक असमान पहुंच और न्यायपूर्ण संक्रमण जैसी कई चुनौतियां एक साथ हैं। उनके मुताबिक, विकासशील देश ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव सबसे ज्यादा झेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि जलवायु संकट सीमाओं का सम्मान नहीं करता, इसलिए UNFCCC जैसे बहुपक्षीय समझौते जरूरी हैं।

अलग-अलग ‘क्लॉक’ से समझें खतरा

पिसुपति ने हीट, ग्लेशियर, समुद्र-स्तर, इकोसिस्टम और मानव क्लॉक का जिक्र किया। तापमान घटने पर गर्मी का असर अपेक्षाकृत जल्दी कम हो सकता है, लेकिन ग्लेशियर और बर्फ की चादरें पुराने रूप में वापस नहीं आएंगी। समुद्र-स्तर बढ़ने का असर भी एक दशक में पलटना संभव नहीं होगा, भले वार्मिंग 1.5°C पर सीमित हो। जैव विविधता का नुकसान सबसे ज्यादा स्थायी जोखिम है, क्योंकि विलुप्त प्रजातियां प्राकृतिक परिस्थितियों में वापस नहीं लाई जा सकतीं। तकनीक कुछ पुराने जैविक तत्वों को दोहरा सकती है, लेकिन सब कुछ नहीं।

किसानों की बदलती जिंदगी

भारत के कुछ इलाकों में सूखे और बाढ़ के कारण खेती करने वाले परिवारों को पलायन और आजीविका बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। पिसुपति ने कहा कि ऐसे बदलावों को दशकों की रिकवरी भी पूरी तरह नहीं पलट सकती। उन्होंने जलवायु न्याय पर भी जोर दिया। CBDR-RC सिद्धांत के तहत सभी देशों को कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन ऐतिहासिक रूप से ज्यादा उत्सर्जन करने वाले विकसित देशों की जिम्मेदारी अधिक होनी चाहिए। पिसुपति ने कहा कि कम प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वाले देशों पर कम जिम्मेदारी और कम संसाधनों के बावजूद ज्यादा असर पड़ता है। भारत की जलवायु वार्ता में CBDR इसी वजह से महत्वपूर्ण है।